नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज अपने गौरवशाली इतिहास के 46वें वर्ष (BJP Foundation Day) में प्रवेश कर रही है, लेकिन इस विशाल वटवृक्ष के बीज दशकों पहले जनसंघ के रूप में बोए जा चुके थे। 6 अप्रैल 1980 को भाजपा का उदय महज एक नई पार्टी का गठन नहीं था, बल्कि वैचारिक शुचिता और ‘दोहरी सदस्यता’ के अपमान के खिलाफ एक विद्रोह था।
सत्ता के गलियारों में भाजपा की कहानी तब शुरू होती है जब 1977 में आपातकाल के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ था। जनता पार्टी के भीतर जब आंतरिक कलह बढ़ी, तो समाजवादियों ने जनसंघ पृष्ठभूमि के नेताओं पर निशाना साधा। शर्त रखी गई कि जो जनता पार्टी का सदस्य होगा, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से संबंध नहीं रख सकेगा। इस दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर समझौता करने के बजाय जनसंघ के नेताओं ने जनता पार्टी से बाहर निकलना बेहतर समझा।
मुंबई के अधिवेशन में जब नई पार्टी की घोषणा हुई, तो इसका नाम ‘भारतीय जनता पार्टी’ रखा गया। दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी की कमान सौंपी गई और वे 1986 तक इसके पहले अध्यक्ष रहे। हालांकि, इस पूरी कहानी का मूल आधार 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा रखी गई भारतीय जनसंघ की नींव थी।

डॉ. मुखर्जी उस समय जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में श्रम मंत्री के तौर पर कार्यरत थे। कश्मीर के विलय, अनुच्छेद 370, अलग झंडे और अलग संविधान के प्रावधानों ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। नेहरू सरकार की नीतियों के विरोध में उन्होंने कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद एक मजबूत राजनीतिक विकल्प की तलाश में उन्होंने तत्कालीन आरएसएस सरसंघचालक श्री गुरुजी से संपर्क साधा।
21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली के राघोमल माध्यमिक विद्यालय में एक साधारण समारोह के बीच भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई। भगवा रंग का झंडा और ‘दीपक’ चुनाव चिह्न तय किया गया। 1952 के पहले आम चुनाव में जनसंघ ने सबको चौंकाते हुए 3.06 प्रतिशत वोट हासिल किए। इस चुनाव में पार्टी के तीन सांसद जीते, जिनमें खुद डॉ. मुखर्जी शामिल थे।
दिलचस्प तथ्य यह है कि गठबंधन की राजनीति जिसे आज एनडीए (NDA) कहा जाता है, उसका बीज भी तभी पड़ गया था। संसद में उन तीन सांसदों के साथ अकाली दल, हिंदू महासभा और द्रविड़ कड़गम जैसे दलों ने मिलकर ‘नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट’ बनाया।

38 सांसदों वाला यह गुट सदन में मुख्य विपक्षी ताकत बना और डॉ. मुखर्जी देश के पहले (अनौपचारिक) नेता प्रतिपक्ष कहलाए। शून्य से शिखर तक का यह सफर आज भाजपा को दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित कर चुका है।








