नई दिल्ली (3 अक्टूबर): त्योहारी सीजन की शुरुआत के साथ ही अगर आप नया घर, कार या कोई बड़ा कर्ज लेने की योजना बना रहे हैं, तो बैंक की मासिक किस्त का गणित (Repo Rate Hike 2026) बिगड़ सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की 5 से 7 अक्टूबर 2026 तक चलने वाली बैठक में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का दबाव साफ दिखाई दे रहा है।
बिजनेस स्टैंडर्ड के एक ताजा सर्वेक्षण में शामिल 10 प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से 8 ने यह अनुमान जताया है कि केंद्रीय बैंक इस बार रेपो रेट (Repo Rate) में 25 आधार अंकों (0.25%) की बढ़ोतरी कर सकता है। अगर यह फैसला हुआ, तो प्रमुख नीतिगत दर मौजूदा 5.25% से बढ़कर 5.50% पर पहुंच जाएगी।
लगातार चार द्वैमासिक समीक्षाओं से केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई फेरबदल नहीं किया था। इससे ठीक पहले 2025 के दौरान कर्जदारों को कुल 125 बेसिस प्वाइंट की राहत दी गई थी, ताकि विकास दर को गति मिल सके। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों ने केंद्रीय बैंक के नीति-निर्माताओं को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।
यदि 7 अक्टूबर को दरों में इजाफे का औपचारिक ऐलान होता है, तो यह फरवरी 2023 के बाद पहला मौका होगा जब रिजर्व बैंक ब्याज दरों में सीधी बढ़ोतरी करेगा।
महंगाई की मार और वैश्विक अनिश्चितता
दरें बढ़ाने की सबसे बड़ी वजह घरेलू स्तर पर खाद्य वस्तुओं और ऊर्जा कीमतों में आया उछाल है। अगस्त 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82% दर्ज की गई। यह लगातार तीसरा ऐसा महीना रहा जब महंगाई का आंकड़ा केंद्रीय बैंक के 4% के तय मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर बना रहा।
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के मोर्चे पर भी तस्वीर चिंताजनक है। अगस्त महीने में थोक महंगाई बढ़कर 9.92% पर पहुंच गई, जो जुलाई में 9.78% थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और भू-राजनीतिक तनावों ने इनपुट लागत को बढ़ा दिया है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि इस स्तर पर नीतिगत सख्ती नहीं दिखाई गई, तो अनियंत्रित महंगाई आर्थिक रिकवरी की रफ्तार को कुंद कर सकती है।
कमजोर होता रुपया और बाहरी दबाव
ब्याज दरों के फैसले में सिर्फ घरेलू महंगाई ही नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा बाजार का दबाव भी अहम कारक बन गया है। इस कैलेंडर वर्ष में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया करीब 6% तक टूटा है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व सहित दुनिया के प्रमुख केंद्रीय बैंकों के रुख के कारण भारत और विकसित देशों के बीच ब्याज दरों का अंतर संवेदनशील मोड़ पर है। रुपये में कमजोरी से आयात महंगा हो रहा है, जिससे आयातित महंगाई (Imported Inflation) का जोखिम बढ़ जाता है। विदेशी संस्थागत निवेशकों के पूंजी प्रवाह को थामे रखने और मुद्रा की स्थिरता के लिए भी दरों का आकर्षक बने रहना जरूरी माना जा रहा है।
ग्राहकों की जेब पर असर: कितना बढ़ेगा EMI का बोझ?
बैंक अब खुदरा कर्जों को सीधे रेपो रेट से जोड़ते हैं, जिसे एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट (EBLR) कहा जाता है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर केंद्रीय बैंक ने 0.25% की वृद्धि की, तो अधिकांश वाणिज्यिक बैंक इसका बोझ तुरंत ग्राहकों पर डाल देंगे।
सालाना आधार पर 30 लाख रुपये के कर्जदार को करीब ₹5,700 और 50 लाख रुपये के कर्जदार को लगभग ₹9,500 से अधिक की अतिरिक्त किस्त चुकानी पड़ सकती है। फ्लोटिंग रेट वाले कर्जदारों के पास आमतौर पर दो विकल्प होते हैं-या तो वे अपनी मासिक किस्त बढ़वाएं या फिर लोन की कुल अवधि (Tenure) लंबी करवा लें। 7 अक्टूबर को गवर्नर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद ही साफ होगा कि त्योहारी बाजार में कर्ज कितना महंगा होने जा रहा है।












