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जानिए क्यों नीलकंठ कहलाए शिवजी और क्या है जलाभिषेक का रहस्य

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Ganga Updated Thu, 13 Aug 2026 09:16 AM IST

सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा सीधे तौर पर समुद्र मंथन और भगवान शिव के विषपान से जुड़ी है। सृष्टि को हलाहल विष से बचाने के लिए शिवजी ने जो त्याग किया था, उसी आभार और भक्ति के रूप में आज भी श्रद्धालु जलाभिषेक करते हैं।

Sawan Shivratri Katha

Sawan Shivratri Katha : सावन शिवरात्रि आते ही देशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लग जाता है। तड़के से ही “हर-हर महादेव” के जयकारों के साथ लोग शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने पहुंचते हैं।

अक्सर मन में यह सवाल उठता है कि सावन के महीने में शिवजी की पूजा और जलाभिषेक का इतना ज्यादा महत्व क्यों है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसका सीधा संबंध पौराणिक काल में हुए समुद्र मंथन और भगवान शिव द्वारा किए गए सबसे बड़े त्याग से है।

जब अमृत से पहले निकला भयंकर हलाहल विष

पौराणिक कथाओं के मुताबिक, एक समय देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर में समुद्र मंथन किया था। उद्देश्य था—अमृत प्राप्त करना।

लेकिन अमृत निकलने से ठीक पहले समुद्र से एक अत्यंत भयानक और विषैला तत्व बाहर आया, जिसे ‘हलाहल’ या ‘कालकूट’ विष कहा गया।

यह विष इतना घातक था कि इसकी तपन और जहरीली हवा से पूरी सृष्टि जलने लगी। देवता और दानव, दोनों ही भयभीत हो गए और संकट की इस घड़ी में सबने भगवान शिव की शरण ली।

संसार की रक्षा के लिए महादेव का महात्याग

सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को स्वयं पीने का निर्णय लिया। उन्होंने विष को गले से नीचे नहीं उतरने दिया और अपने कंठ में ही रोक लिया।

विष के तीव्र प्रभाव के कारण उनका कंठ नीला पड़ गया। इसी ऐतिहासिक घटना के बाद महादेव ‘नीलकंठ’ नाम से जाने गए। माता पार्वती ने भी उनके गले पर हाथ रखकर उस विष को शरीर में फैलने से रोक लिया था।

जलाभिषेक की परंपरा कैसे हुई शुरू?

हलाहल विष की गर्मी इतनी भयानक थी कि भगवान शिव के शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया था। उनके शरीर की उस जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर लगातार शीतल जल और गंगाजल अर्पित किया। जड़ी-बूटियों और ठंडे बेलपत्र भी चढ़ाए गए।

माना जाता है कि यह पूरी घटना सावन के महीने में ही हुई थी। यही वजह है कि आज भी सावन शिवरात्रि के दिन भक्त शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाकर महादेव के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

केवल पूजा नहीं, जीवन की बड़ी सीख भी है यह कथा

समुद्र मंथन का प्रसंग हमें जीवन के कई व्यावहारिक पहलू भी सिखाता है:

कठिनाई के बाद ही सफलता: किसी भी बड़े काम या लक्ष्य को हासिल करने से पहले रुकावटें और विष रूपी चुनौतियां आती ही हैं।

सहनशीलता और धैर्य: संकट के समय शांत रहकर सही फैसला लेना ही असली नेतृत्व है।

दूसरों के हित में त्याग: समाज और परिवार की भलाई के लिए कभी-कभी अपनी खुशियों से परे सोचना पड़ता है।

सावन शिवरात्रि सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव के उस महान त्याग की याद दिलाता है जिसने पूरी सृष्टि को नया जीवन दिया था।

Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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