नई दिल्ली, 01 अप्रैल (दून हॉराइज़न)। देश के करोड़ों मरीजों को बड़ी राहत देते हुए केंद्र सरकार अब दवा बाजार के दशकों पुराने ढर्रे को बदलने जा रही है। जल्द ही आपको मेडिकल स्टोर से दवा का पूरा पत्ता (Medicine Purchase Rules) खरीदने की मजबूरी से आजादी मिल सकती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, अब केमिस्ट को डॉक्टर के पर्चे पर लिखी गई सटीक संख्या के हिसाब से ही दवा देनी होगी।
सरकार के इस प्रस्ताव पर भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) की हाई-लेवल बैठक में विस्तृत चर्चा हो चुकी है। वर्तमान में अधिकांश दवाएं 10 या 15 गोलियों की स्ट्रिप में आती हैं। अक्सर मरीजों को सिर्फ 3 या 5 दिनों का कोर्स करना होता है, लेकिन दुकानदार स्ट्रिप काटने से इनकार कर देते हैं। इससे मरीजों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और बची हुई दवाएं घर के कोनों में बेकार पड़ी रहती हैं।
यह कदम भारत के 50 अरब डॉलर के विशाल फार्मा सेक्टर और लगभग 27 अरब डॉलर के रिटेल फार्मेसी बाजार के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। खासकर उन मरीजों के लिए यह फैसला वरदान बनेगा जिन्हें कैंसर, किडनी या हार्ट संबंधी महंगी दवाएं लेनी पड़ती हैं। कई बार एक स्ट्रिप की कीमत ₹300 से ₹1000 के बीच होती है, जहां 2-3 गोलियां अतिरिक्त खरीदना भी आम आदमी का बजट बिगाड़ देता है।

दवा सुरक्षा को लेकर सरकार बेहद गंभीर है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि स्ट्रिप काटने के बाद बचे हुए हिस्से पर बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी की जानकारी गायब हो जाती है। इस तकनीकी समस्या को सुलझाने के लिए एक विशेष उप-समिति (Sub-committee) बनाई गई है। यह समिति सुझाव देगी कि क्यूआर कोड (QR Code) या हर टैबलेट के पीछे जरूरी जानकारी छापने जैसे विकल्पों को कैसे लागू किया जाए।
ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) ने इस पर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। संगठन के अध्यक्ष राजीव सिंघल का कहना है कि अगर कटी हुई स्ट्रिप नहीं बिकती है, तो इसका नुकसान मेडिकल स्टोर संचालकों को उठाना होगा।
केमिस्ट्स ने सुझाव दिया है कि कंपनियां 50 या 15 गोलियों के बड़े पैक के बजाय अधिकतम 10 गोलियों की छोटी पैकिंग ही बनाएं। उन्होंने यह भी मांग की है कि बची हुई दवाओं को वापस लेने (Buyback) की व्यवस्था दवा कंपनियां खुद करें।
फार्मा एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में ‘यूनिट डोज डिस्पेंसिंग’ का सिस्टम पहले से लागू है। वहां मरीज को उतनी ही गोलियां एक अलग पैकेट में दी जाती हैं जितनी जरूरत हो। भारत में इसे लागू करने के लिए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट में संशोधन की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि यह नियम जमीन पर उतरता है, तो सालाना करोड़ों रुपये की दवा को बर्बाद होने से बचाया जा सकेगा।









