Prebiotic vs Probiotic : रसोई की थाली से लेकर मेडिकल स्टोर की शेल्फ तक इन दिनों गट हेल्थ (Gut Health) यानी पाचन तंत्र की मजबूती को लेकर जबरदस्त चर्चा है। लोग धड़ल्ले से बाजारू ड्रिंक्स और महंगे कैप्सूल खरीद रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रीबायोटिक और प्रोबायोटिक असल में एक नहीं, बल्कि दो बिल्कुल अलग तत्व हैं?
सरल शब्दों में फर्क इतना है: प्रोबायोटिक वे जिंदा, मददगार सूक्ष्मजीव हैं जो आपकी आंतों में डेरा डालकर पाचन सुधारते हैं, और प्रीबायोटिक वह खास प्लांट फाइबर है जिसे हमारे एंजाइम पचा नहीं पाते, मगर ये अच्छे बैक्टीरिया उसे खाकर फलते-फूलते हैं। यानी एक माली है, तो दूसरा खाद।
फर्मेंटेड फूड बनाम जीवित प्रोबायोटिक्स

बाजार में मिलने वाले हर खमीर उठे या फर्मेंटेड उत्पाद को प्रोबायोटिक मान लेना सबसे आम चूक है। पारंपरिक रूप से जमाया गया ताजा दही, छाछ, कांजी या दक्षिण भारतीय इडली-डोसा बैटर प्राकृतिक फर्मेंटेशन से बनते हैं।
मगर चिकित्सीय दृष्टि से प्रोबायोटिक (Probiotics) का तमगा केवल उन्हीं उत्पादों को मिलता है जिनमें लैक्टोबैसिलस या बिफिडोबैक्टीरियम जैसे परखे हुए स्ट्रेन जीवित अवस्था में पर्याप्त संख्या यानी ‘कॉलोनाइजिंग यूनिट्स’ में मौजूद हों।
यदि पैकेट बंद चीज को पाश्चुरीकृत या अत्यधिक गर्म कर दिया जाए, तो उसके लाभकारी बैक्टीरिया वैसे ही खत्म हो जाते हैं।
प्रीबायोटिक्स: आंतों के बैक्टीरिया की असली खुराक
प्रीबायोटिक कोई दवा नहीं, बल्कि जटिल कार्बोहाइड्रेट और नॉन-डाइजेस्टेबल फाइबर हैं। जब आप कच्चा प्याज, लहसुन, कच्चा केला, दलिया, जई (Oats), अलसी या राजमा और दालें खाते हैं, तो इनका फाइबर छोटी आंत में बिना टूटे सीधे बड़ी आंत तक पहुंचता है।
वहां मौजूद अरबों मित्र जीवाणु इस पर किण्वन (फर्मेंटेशन) करते हैं। इस प्रक्रिया से ‘शॉर्ट चेन फैटी एसिड्स’ जैसे ब्यूटायरेट बनते हैं, जो आंतों की अंदरूनी परत को सूजन से बचाते हैं।
लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है। फाइबर के प्रति अति-उत्साह नुकसानदेह हो सकता है। यदि किसी ने अचानक अपनी थाली में कच्ची सलाद और इसबगोल की मात्रा तीन गुनी कर दी, तो आंतों को संभलने का वक्त नहीं मिलेगा। नतीजा—पेट में असहनीय मरोड़, अफरा और गैस। फाइबर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाएं और साथ में पानी का घूंट-घूंट सेवन जारी रखें।
सप्लीमेंट का अंधानुकरण या प्राकृतिक आहार?
क्या हर वयस्क को रोज सुबह प्रोबायोटिक कैप्सूल निगलने की जरूरत है? गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट इस चलन का बिल्कुल समर्थन नहीं करते।

जब तक किसी व्यक्ति को एंटीबायोटिक दवाओं का भारी कोर्स न चला हो, या वह आईबीडी (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) जैसी स्थिति से न जूझ रहा हो, तब तक मेडिकल सप्लीमेंट की जरूरत विरले ही पड़ती है।
अलग-अलग बीमारियों के लिए बैक्टीरिया के स्ट्रेन भी अलग-अलग होते हैं; कोई एक कैप्सूल पूरे पाचन तंत्र का इलाज नहीं हो सकता।
आंतों के माइक्रोबायोम को दुरुस्त रखने का सबसे सुरक्षित फॉर्मूला विभिन्न रंगों वाली मौसमी सब्जियों, मोटे अनाजों और सात घंटे की गहरी नींद से होकर ही गुजरता है।







