पटियाला, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। पंजाब की न्यायिक व्यवस्था को शर्मसार करने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां न्याय की कुर्सी पर बैठने वाले एक शख्स पर ही चोरी का संगीन इल्जाम लगा है। पटियाला की एक अदालत ने बुधवार को स्पष्ट कर दिया कि चाहे कोई कितना भी बड़ा पद धारण क्यों न करता हो, कानून के लंबे हाथ उस तक पहुंच ही जाते हैं। कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिविजन) बिक्रमदीप सिंह की अग्रिम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है।
यह पूरी कहानी 1 अगस्त 2025 की उस काली रात से शुरू होती है, जब जज कंवलजीत सिंह का पटियाला के अमर अस्पताल में दुखद निधन हो गया था। अभी उनके पार्थिव शरीर की मिट्टी ठंडी भी नहीं हुई थी कि साजिश के खिलाड़ियों ने अपना खेल शुरू कर दिया।
आरोप है कि जब कंवलजीत सिंह का शव अस्पताल में रखा था, तब आरोपी जज बिक्रमदीप सिंह ने मृतक की घरेलू सहायिका अमरजोत कौर उर्फ पिंकी, एक सरकारी अधिकारी गौरव गोयल और एक अन्य अज्ञात व्यक्ति के साथ मिलकर उनके विकास कॉलोनी स्थित घर पर धावा बोल दिया।

पुलिस जांच और कोर्ट में पेश किए गए साक्ष्यों के अनुसार, इन लोगों ने घर के अंदर से भारी मात्रा में सोना, कीमती जेवर और नकदी पर हाथ साफ कर दिया। इस मामले का खुलासा तब हुआ जब पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला में लॉ प्रोफेसर डॉ. भूपिंदर सिंह विर्क ने इस पूरे घटनाक्रम की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई। शुरुआती जांच में जो सीसीटीवी फुटेज सामने आए, उन्होंने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हरिंदर सिद्धू ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि सीसीटीवी फुटेज में आरोपियों की मौजूदगी और उनकी भूमिका साफ तौर पर ‘प्राइमा फेसी’ (प्रथम दृष्टया) साबित होती है।
फुटेज में आरोपी जज और उनके साथी घर के अंदर जाते और बाहर निकलते समय बड़े-बड़े बैग और डिब्बे ले जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि उनकी बॉडी लैंग्वेज और सामान ले जाने का तरीका यह बताने के लिए काफी है कि यह काम किसी अनुमति से नहीं, बल्कि बेहद गुपचुप तरीके से अंजाम दिया गया था।
बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी थी कि आरोपी को व्हाट्सएप चैट और कॉल के जरिए घर जाने की अनुमति मिली थी। हालांकि, अदालत ने इस दावे की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि यह कथित बातचीत चोरी की घटना के बाद की है। रिकॉर्ड के मुताबिक, सीसीटीवी फुटेज रात 9:50 बजे तक की है, जबकि बचाव पक्ष जिस पहले मैसेज का हवाला दे रहा है, वह रात 10:17 बजे किया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उन संदेशों में केवल शोक संवेदनाएं थीं, किसी भी प्रकार की अनुमति का कोई जिक्र नहीं था।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य (1991)’ मामले का जिक्र करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों को दी गई सुरक्षा उन्हें मनमानी गिरफ्तारी से बचाने के लिए है, न कि उन्हें अपराध करने की खुली छूट देने के लिए। कोर्ट ने माना कि इस मामले में अभी भी बहुत सारा सामान बरामद होना बाकी है और पूरी साजिश की गहराई तक जाने के लिए आरोपी की कस्टोडियल पूछताछ (हिरासत में पूछताछ) अनिवार्य है।








