नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण (Supreme Court OBC Reservation) को लेकर एक दूरगामी फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि क्रीमी लेयर की पहचान के लिए केवल पैसा ही एकमात्र पैमाना नहीं हो सकता।
शीर्ष अदालत ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी उम्मीदवार को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के लिए उसकी पारिवारिक आय के साथ-साथ उसके सामाजिक और पेशेवर दर्जे का आकलन करना भी जरूरी है।
पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि पदों की श्रेणियों और स्टेटस मापदंडों को नजरअंदाज कर केवल बैंक बैलेंस या सालाना कमाई के आधार पर फैसला लेना कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक न्याय का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उन लोगों को आगे लाना है जो ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे हैं।

केवल 8 लाख की आय काफी नहीं
वर्तमान में लागू नियमों के मुताबिक, यदि किसी ओबीसी परिवार की सालाना आय 8 लाख रुपये या उससे अधिक है, तो उसे ‘क्रीमी लेयर’ मान लिया जाता है। ऐसे उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। आय की यह सीमा साल 2017 में 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख रुपये की गई थी।
अदालत ने संकेत दिया है कि सरकार को 1993 के उन नियमों की समीक्षा करनी चाहिए जो क्रीमी लेयर की पहचान करते हैं। जजों का मानना है कि एक कम वेतन पाने वाला व्यक्ति यदि किसी ऊंचे प्रशासनिक पद पर बैठा है, तो उसकी सामाजिक स्थिति एक अमीर व्यापारी से बिल्कुल अलग हो सकती है। इसलिए, स्टेटस और इनकम दोनों का मेल होना अनिवार्य है।

1992 के ऐतिहासिक फैसले का संदर्भ
क्रीमी लेयर की अवधारणा साल 1992 के चर्चित ‘इंद्रा सहनी बनाम भारत सरकार’ मामले से निकली थी। उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था, लेकिन शर्त रखी थी कि इस वर्ग के संपन्न तबके को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए। इसका मकसद यह था कि आरक्षण की मलाई केवल उन्हीं तक न सिमट जाए जो पहले से मजबूत हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद अब केंद्र सरकार पर आरक्षण के वर्तमान मापदंडों को बदलने का दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार नए सिरे से नियम तय करती है, तो लाखों उम्मीदवारों के लिए आरक्षण के समीकरण बदल सकते हैं। इसमें उन युवाओं को बड़ी राहत मिल सकती है जो केवल आय सीमा के कारण इस लाभ से वंचित रह जाते थे।









