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दिन में हार्डवेयर, रात में जिस्म का बाजार जानिए दिल्ली के GB रोड का असली मालिक कौन है?

दिल्ली का GB रोड एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर मार्केट के साथ-साथ भारत के सबसे बड़े रेड लाइट एरिया के रूप में कुख्यात है। ब्रिटिश काल में पांच अलग-अलग बाजारों को मिलाकर बनाए गए इस इलाके का कोई एक मालिक नहीं, बल्कि यह निजी संपत्तियों और सिंडिकेट का एक जटिल जाल है।

GB Road

HIGHLIGHTS

  • ब्रिटिश कमिश्नर जॉन गारस्टिन ने 1966 में स्वामी श्रद्धानंद मार्ग बने इस इलाके को बसाया था।
  • यहाँ की जमीनों का मालिकाना हक निजी हाथों में है, जबकि सड़क और बुनियादी ढांचा MCD के अधीन आता है।
  • दिन में यहाँ करोड़ों का हार्डवेयर कारोबार होता है और रात में ऊपरी मंजिलों पर करीब 100 से ज्यादा अवैध ब्रोथल सक्रिय हो जाते हैं।

नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। दिल्ली के दिल में स्थित अजमेरी गेट से लाहौरी गेट तक फैला 800 मीटर का वह टुकड़ा, जिसे दुनिया (GB Road) के नाम से जानती है, अपनी दोहरी शख्सियत के लिए मशहूर है।

सूरज की रोशनी में यहाँ एशिया के सबसे बड़े हार्डवेयर और ऑटो पार्ट्स मार्केट की धमक सुनाई देती है, लेकिन चाँद ढलते ही दुकानों के ऊपर बनी सीढ़ियां एक ऐसे नर्क की ओर ले जाती हैं जहाँ हजारों जिंदगियों की नीलामी होती है।

हकीकत यह है कि GB रोड का कोई एक इकलौता “डॉन” या मालिक नहीं है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह पूरी सड़क दिल्ली नगर निगम (MCD) के अधिकार क्षेत्र में आती है।

हालांकि, सड़क के दोनों ओर खड़ी बहुमंजिला इमारतों की कानूनी स्थिति काफी पेचीदा है। ग्राउंड फ्लोर पर स्थित दुकानें ज्यादातर निजी व्यापारियों के पास हैं, जबकि ऊपरी मंजिलों पर मौजूद 100 से अधिक कोठों का संचालन “मादम” या “मल्किन” के नाम से जानी जाने वाली महिलाओं द्वारा किया जाता है।

इस इलाके का नाम गारस्टिन बेस्टियन (Garstin Bastion) रोड था, जिसे 1966 में बदलकर स्वामी श्रद्धानंद मार्ग कर दिया गया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, मुगल काल के दौरान दिल्ली में चावड़ी बाजार जैसे पांच अलग-अलग क्षेत्रों में तवायफों के कोठे हुआ करते थे।

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने इन ठिकानों को उजाड़ना शुरू किया। तत्कालीन ब्रिटिश कमिश्नर जॉन गारस्टिन ने शहर की “मर्यादा” बचाने के नाम पर इन पांचों रेड लाइट एरिया को एक ही जगह समेट दिया, जिसे आज GB रोड कहा जाता है।

वर्तमान में यहाँ नेपाल, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से लाई गई करीब 1,000 से 4,000 लड़कियां और महिलाएं बदहाली में रहने को मजबूर हैं।

हैरानी की बात यह है कि जहाँ नीचे की दुकानों का किराया और मालिकाना हक कानूनी रूप से स्पष्ट है, वहीं ऊपर चल रहे देह व्यापार के अड्डों को हटाने की मांग दशकों से उठती रही है। पुलिस और प्रशासन की फाइलों में ये इमारतें निजी संपत्ति दर्ज हैं, जिसका फायदा उठाकर यहाँ दशकों से अनैतिक धंधा फल-फूल रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि इस पूरे सिंडिकेट को स्थानीय रसूखदार और छोटे-बड़े दलालों का संरक्षण प्राप्त है।

सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन भले ही सार्वजनिक उपयोग के लिए हो, लेकिन यहाँ की संकरी गलियों और घुमावदार सीढ़ियों पर कब्जा आज भी उन्हीं अज्ञात हाथों का है, जो रात के अंधेरे में जिस्मफरोशी का बाजार सजाते हैं।


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Gudiya Sagar

गुड़िया सागर 'दून हॉराइज़न' की मल्टीमीडिया और ट्रेंडिंग न्यूज़ प्रोड्यूसर हैं। वे करियर, वायरल खबरों और वीडियो जर्नलिज्म में विशेष विशेषज्ञता रखती हैं। डिजिटल मीडिया के बदलते ट्रेंड्स और युवाओं की पसंद को समझना गुड़िया की सबसे बड़ी ताकत है। सरकारी नौकरियों, शिक्षा और करियर से जुड़ी हर अहम जानकारी वे पूरी फैक्ट-चेकिंग के बाद ही युवाओं तक पहुंचाती हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रही भ्रामक खबरों की सच्चाई (Fact Check) सामने लाने और वीडियो फॉर्मेट में निष्पक्ष खबरें पेश करने के लिए गुड़िया को पत्रकारिता जगत में विशेष रूप से जाना जाता है।

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