नई दिल्ली 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। प्रकृति के आंगन में सूर्योदय की दस्तक से पहले गूंजने वाली मुर्गे की बांग महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक जटिल जैविक प्रक्रिया और सामाजिक शिष्टाचार का मेल है। सदियों से लोग इसे सुबह होने का संकेत मानते आए हैं, लेकिन विज्ञान कहता है कि मुर्गे का मकसद इंसानों को नींद से जगाना बिल्कुल नहीं होता।
मुर्गे की बांग की तीव्रता किसी जेट इंजन के शोर के करीब पहुंच सकती है। शोध बताते हैं कि एक मुर्गा जब पूरी ताकत से बांग देता है, तो उसकी आवाज की तीव्रता लगभग 143 डेसिबल तक दर्ज की गई है। ताज्जुब की बात यह है कि इंसान 130 डेसिबल से अधिक का शोर बर्दाश्त नहीं कर सकता और बहरा हो सकता है, लेकिन मुर्गे इंसानों से दूरी बनाए रखते हैं जिससे यह खतरा टल जाता है।
मुर्गे के भीतर ‘सिरकेडियन रिंग’ नाम का एक विशेष सेंसर यानी बायोलॉजिकल क्लॉक होती है। यह सेंसर उसे प्रकाश की पहली किरण फूटने से काफी पहले ही सचेत कर देता है कि सूर्योदय होने वाला है। दिलचस्प बात यह है कि उम्र बढ़ने के साथ यह आंतरिक घड़ी और भी सटीक तरीके से काम करने लगती है, जिससे बुजुर्ग मुर्गे सबसे पहले सक्रिय होते हैं।
मुर्गों की दुनिया में अनुशासन का कड़ा पालन होता है। जब भी सुबह होती है, तो सबसे पहले घर का ‘मुखिया’ यानी सबसे उम्रदराज मुर्गा ही बाहर निकलकर बांग देता है। उसे आभास होता है कि रोशनी आने वाली है और वह अपने परिवार को सतर्क करता है। मुख्य मुर्गे की आवाज सुनने के बाद ही बाकी युवा मुर्गे बाहर आते हैं और अपनी बारी का इंतजार करते हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि मुर्गे कभी एक साथ चिल्लाकर शोर नहीं मचाते। जब एक मुर्गा अपनी बांग पूरी कर लेता है, तभी दूसरा शुरू करता है। यह एक तरह का ‘वोकल टर्न-टेकिंग’ है, जो उनके बीच के आपसी तालमेल और पदानुक्रम (Hierarchy) को दर्शाता है। वे अपनी आवाज के जरिए दूसरे समूहों को अपनी सीमा का अहसास भी कराते हैं।
एक आम धारणा यह भी है कि मुर्गियां भी बांग देती हैं, लेकिन यह पूरी तरह गलत है। बांग देने का काम केवल नर मुर्गा ही करता है। वह अपनी इस जोरदार आवाज का उपयोग अपने क्षेत्र की रक्षा करने और अपने झुंड की मुर्गियों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए करता है। जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, इनका यह उत्साह और भी स्पष्ट होता जाता है।










