नई दिल्ली, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। महिलाओं के शरीर की बनावट को लेकर अक्सर कई तरह की चर्चाएं और भ्रांतियां सुनने को मिलती हैं, लेकिन इसके पीछे का सच पूरी तरह से विज्ञान और विकास (Evolution) पर आधारित है।
जैविक संरचना की बात करें तो महिलाओं की पेल्विक बोन यानी कूल्हे की हड्डी पुरुषों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक चौड़ी और गोलाकार होती है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है बल्कि प्रकृति का एक मास्टर प्लान है। मानव विकास के दौरान, बड़ी खोपड़ी वाले बच्चों के सुरक्षित जन्म के लिए महिला शरीर में ‘बर्थ कैनाल’ को चौड़ा रखा गया। यही कारण है कि उनके हिप्स की चौड़ाई पुरुषों से अधिक दिखाई देती है।
एस्ट्रोजन और फैट स्टोरेज का कनेक्शन
प्यूबर्टी यानी किशोरावस्था की शुरुआत होते ही लड़कियों के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है। यह हार्मोन शरीर को निर्देश देता है कि वसा (Fat) का संचय पेट के बजाय मुख्य रूप से हिप्स, जांघों और कूल्हों के आसपास किया जाए।
विज्ञान की भाषा में इसे ‘गाइनोइड’ फैट डिस्ट्रीब्यूशन कहा जाता है। यह वसा केवल सुंदरता के लिए नहीं होती, बल्कि यह गर्भावस्था के दौरान ऊर्जा के भंडार के रूप में काम करती है। इसके विपरीत, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन फैट को शरीर के मध्य भाग यानी पेट के आसपास जमा करता है।
उम्र के साथ बदलता है पेल्विस का आकार
ताजा शोध और एंथ्रोपोलॉजिकल डेटा एक चौंकाने वाला तथ्य पेश करते हैं। महिला का पेल्विस जीवनभर एक जैसा नहीं रहता। 25 से 30 वर्ष की आयु के बीच, जब फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) अपने चरम पर होती है, तब पेल्विक बोन अपनी अधिकतम चौड़ाई पर पहुंचती है।
दिलचस्प बात यह है कि 40 वर्ष की आयु के बाद और मेनोपॉज के करीब आने पर, एस्ट्रोजन का स्तर गिरने लगता है। इसके परिणामस्वरूप पेल्विक बोन फिर से सिकुड़ने लगती है। यह बदलाव साबित करता है कि कूल्हों का आकार पूरी तरह से हार्मोनल उतार-चढ़ाव और रिप्रोडक्टिव स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।
मिथकों और दावों की हकीकत
समाज में यह भ्रांति भी फैली है कि किसी महिला के हिप्स का आकार उसकी सेक्स लाइफ या पार्टनर्स की संख्या से प्रभावित होता है। मेडिकल साइंस इसे पूरी तरह सिरे से खारिज करता है। शारीरिक बदलावों का यौन संबंधों से कोई लेना-देना नहीं होता।
हालांकि, कुछ अध्ययनों में यह जरूर संकेत मिला है कि चौड़े हिप्स वाली महिलाओं में प्रसव के दौरान ‘ट्रॉमा’ या जटिलताओं का खतरा कम हो सकता है। लेकिन इसे भी अंतिम सच नहीं माना जा सकता क्योंकि डिलीवरी की जटिलता बच्चे के सिर के आकार और मां की ओवरऑल मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है।











