नई दिल्ली, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारतीय राजमार्गों पर दौड़ते भारी-भरकम ट्रकों के पीछे लटकता हुआ एक पुराना, घिसा हुआ जूता अक्सर राहगीरों के लिए कौतूहल का विषय रहता है। पहली नजर में इसे ‘नजरबट्टू’ या किसी तांत्रिक क्रिया से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी असलियत कबाड़ से निकली एक ऐसी इंजीनियरिंग ट्रिक है जिसने दशकों तक ड्राइवरों को हादसों से बचाया है।
उस दौर में जब सड़कों पर आज की तरह अत्याधुनिक धर्मकांटे (वेब्रिज) या डिजिटल वजन मापने वाली मशीनें हर मोड़ पर उपलब्ध नहीं थीं, तब ड्राइवरों ने ओवरलोडिंग से बचने का यह अनोखा रास्ता निकाला था। ट्रक की बॉडी के निचले हिस्से में एक निश्चित ऊंचाई पर रस्सी के सहारे पुराना जूता या चप्पल बांधी जाती थी। यह जूता दरअसल एक मैन्युअल लोड सेंसर की तरह काम करता था।
जब ट्रक खाली होता या उसमें सीमित वजन भरा होता, तो यह जूता सड़क की सतह से कुछ इंच ऊपर हवा में झूलता रहता था। जैसे-जैसे ट्रक में माल की लोडिंग बढ़ती, कमानी (सस्पेंशन) दबने के कारण ट्रक की चेसिस नीचे झुकती चली जाती थी। अगर लोडिंग के दौरान जूता सड़क को छूने लगता या जमीन पर रगड़ने लगता, तो ड्राइवर को तुरंत संकेत मिल जाता था कि अब गाड़ी की क्षमता जवाब दे रही है और ओवरलोडिंग के कारण टायर फटने का खतरा बढ़ गया है।
आज तकनीक बदल गई है और हर टोल प्लाजा या डिपो पर सटीक वजन नापने की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन यह चलन ड्राइवरों के बीच एक अटूट परंपरा बन गया है। अब इसे सुरक्षा और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। ड्राइवरों का मानना है कि यह फटा जूता न केवल सड़क हादसों को टालता है, बल्कि ट्रक की लंबी उम्र और सुरक्षित सफर की गारंटी भी देता है, जो इसे अब पूरी तरह से एक सांस्कृतिक पहचान बना चुका है।









