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UPI Payment : UPI से बड़ा भुगतान करने से पहले जान लें ये नियम, अधिकतम ₹300 तक कटेगा MDR शुल्क

15 अक्टूबर से चुनिंदा मर्चेंट UPI पेमेंट पर 0.4% MDR लागू होगा। ₹2,000 तक के रोजमर्रा के भुगतान और P2P ट्रांसफर पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। जानिए आम यूजर और दुकानदारों पर क्या असर पड़ेगा।

Published On: October 3, 2026 1:41 PM
UPI Payment

HIGHLIGHTS

  • ₹2,000 तक के रोजमर्रा के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर कोई चार्ज नहीं लगेगा।
  • आम लोगों के बीच होने वाले P2P लेन-देन पूरी तरह मुफ्त रहेंगे।
  • केवल चुनिंदा मर्चेंट पेमेंट्स (P2M) पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू होगा।
  • ₹75,000 या अधिक राशि के ट्रांजैक्शन पर अधिकतम ₹300 चार्ज की सीमा तय।
  • सरकार के मुताबिक देश के 96% मर्चेंट लेन-देन इस नए दायरे से बाहर हैं।

नई दिल्ली (3 अक्टूबर): देश में रोजमर्रा की चाय की चुस्की से लेकर राशन की खरीदारी तक डिजिटल लेन-देन की रीढ़ बन चुके यूपीआई (UPI Payment) को लेकर सोशल मीडिया पर चार्ज कटने की अफवाहें गर्म हैं। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और बैंकिंग ढांचे को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए आगामी 15 अक्टूबर 2026 से चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (Merchant Discount Rate) व्यवस्था लागू की जा रही है। साफ़ समझ लीजिए—यह कोई नया टैक्स नहीं है और न ही आपकी जेब से सीधे पैसे कटने वाले हैं।

96% आम ट्रांजैक्शन पूरी तरह से सुरक्षित

नए नियमों की सबसे बड़ी राहत यह है कि आम उपभोक्ता के सामान्य लेन-देन पर इसका रत्ती भर असर नहीं होगा। अगर आप किसी दुकान पर ₹2,000 तक की खरीदारी करते हैं, तो उस पर कोई मर्चेंट डिस्काउंट रेट लागू नहीं होगा। इतना ही नहीं, परिवार या दोस्तों को सीधे खाते से पैसे भेजने यानी पर्सन-टू-पर्सन (P2P UPI) ट्रांसफर पहले की तरह शत-प्रतिशत मुफ्त रहेंगे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में होने वाले कुल मर्चेंट भुगतानों में से लगभग 96 फीसदी लेन-देन ₹2,000 की सीमा के भीतर ही आते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो फल, सब्जी, दूध, दवाई और दैनिक घरेलू सामान की खरीदारी पर किसी तरह का अतिरिक्त बोझ नहीं आने वाला।

अब सवाल उठता है कि आखिर यह 0.4% की कटौती कहां और कैसे होगी?

यह नियम केवल पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यानी ग्राहकों द्वारा कारोबारी खातों में ₹2,000 से अधिक के किए जाने वाले चुनिंदा भुगतानों पर प्रभावी होगा। यह चार्ज ग्राहक के बैंक खाते से नहीं, बल्कि पेमेंट स्वीकार करने वाले मर्चेंट के खाते से काटा जाएगा। बड़े लेन-देन को सुरक्षित रखने और कारोबारियों को भारी नुकसान से बचाने के लिए इसमें कैपिंग का प्रावधान है।

यदि कोई लेन-देन ₹75,000 या उससे अधिक का होता है, तो उस पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट अधिकतम ₹300 प्रति ट्रांजैक्शन ही सीमित रहेगा, भले ही बिल राशि लाखों में क्यों न हो। इसके साथ ही आवश्यक सेवाओं, कम मार्जिन वाले किराना और यूटिलिटी सेक्टरों के लिए अलग से रियायती फ्लैट शुल्क तय किए गए हैं।

बाजार पर क्या पड़ेगा असर और क्यों उठ रही कैश की मांग?

ग्राहकों पर सीधा असर न होने के बावजूद जमीनी स्तर पर थोक और खुदरा कारोबारियों का व्यवहार बदल सकता है। जब कोई छोटा दुकानदार अपने होलसेलर या डिस्ट्रीब्यूटर को माल मंगाने के लिए ₹20,000 या ₹50,000 का डिजिटल भुगतान करेगा, तो उस पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट की सीधी चपत लगेगी। कई खुदरा व्यापारी बहुत मामूली मार्जिन पर काम करते हैं; ऐसे में डिजिटल लेन-देन की अतिरिक्त लागत से बचने के लिए वे ग्राहकों से बड़े बिल के बदले नकद भुगतान की मांग कर सकते हैं।

वित्त मंत्रालय ने इस पर स्थिति साफ करते हुए कहा है कि यह सरकार की कोई कमाई नहीं है, बल्कि बैंकों, यूपीआई ऐप्स और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर के संचालन खर्च को संतुलित करने का एक माध्यम है। 15 अक्टूबर के बाद यह देखना बेहद अहम होगा कि खुदरा बाजार इस नई लागत को खुद वहन करता है या फिर बड़े बिलों में नकदी का पुराना दौर लौटता है।

Parul Sharma

पारुल शर्मा 'दून हॉराइज़न' के बिज़नेस सेक्शन की एक अनुभवी आर्थिक एवं व्यापार संवाददाता हैं। राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, बैंकिंग सेक्टर और पर्सनल फाइनेंस उनकी मुख्य बीट (Beat) है। पारुल को मार्केट के उतार-चढ़ाव और कंज्यूमर ट्रेंड्स का सटीक विश्लेषण करने में खास महारत हासिल है। वह अपनी रिपोर्टिंग में हमेशा प्रामाणिक सरकारी आंकड़ों और विश्वसनीय स्रोतों का ही इस्तेमाल करती हैं। पारुल का मुख्य उद्देश्य बजट, टैक्स नियमों और निवेश से जुड़ी अहम खबरों को बिना किसी लाग-लपेट के सीधे पाठकों तक पहुंचाना है, जिससे आम आदमी का वित्तीय ज्ञान और अधिक मजबूत हो सके।

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