Jio Satellite Connectivity : देश भर में 4G, 5G और ऑप्टिकल फाइबर का जाल बिछाने के बाद रिलायंस जियो ने अंतरिक्ष आधारित टेलीकॉम नेटवर्क की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नई दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026’ (IMC) के 10वें संस्करण में कंपनी ने अपनी ‘सॉवरेन सैटेलाइट कनेक्टिविटी’ योजना का खाका पेश किया। इस परियोजना के तहत लगभग 1,600 लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स का समूह और भारत के भीतर 23 अत्याधुनिक ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ‘स्केल विदाउट बाउंड्रीज’ थीम के साथ इस टेक महाकुंभ का उद्घाटन किया। इसी सोच के अनुरूप जियो का यह तकनीकी मॉडल उन सुदूर इलाकों को सीधे नेटवर्क से जोड़ेगा, जहां भौगोलिक विषमताओं के कारण केबल बिछाना या मोबाइल टावर लगाना अब तक संभव नहीं हो सका है।
जमीन से अंतरिक्ष का तालमेल

जियो के इस इंफ्रास्ट्रक्चर का केंद्रबिंदु भारत में बनने वाले 23 ग्राउंड स्टेशन होंगे। तकनीकी रूप से ये स्टेशन अंतरिक्ष में तैरते सैटेलाइट्स और धरती पर मौजूद मौजूदा कोर टेलीकॉम नेटवर्क के बीच डेटा ब्रिज की तरह काम करेंगे।
| प्रमुख घटक | प्रस्तावित क्षमता / विवरण | मुख्य उपयोग |
| सैटेलाइट फ्लीट | ~1,600 LEO (लो अर्थ ऑर्बिट) उपग्रह | न्यूनतम लेटेंसी के साथ हाई-स्पीड डेटा ट्रांसमिशन |
| ग्राउंड स्टेशन | 23 भारतीय गेटवे स्टेशन | अंतरिक्ष और जमीनी टेलीकॉम ग्रिड का एकीकरण |
| सर्विस कवरेज | 100% भारतीय भूभाग और समुद्री सीमा | 6 लाख से ज्यादा गांव, बॉर्डर आउटपोस्ट और द्वीप |
| विशेष फीचर | डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) कॉलिंग | बिना टावर सीधे हैंडसेट पर इमरजेंसी और वॉयस कनेक्टिविटी |
सॉवरेन मॉडल का सबसे अहम पहलू डेटा सुरक्षा है। कंपनी की योजना डिजाइनिंग, हार्डवेयर टेस्टिंग, लॉन्चिंग और नेटवर्क ऑपरेशन की पूरी चेन पर घरेलू नियंत्रण बनाए रखने की है, जिससे संवेदनशील रक्षा और रणनीतिक संचार विदेशी निर्भरता से मुक्त रहे।
बॉर्डर, समुद्र और आपदा प्रबंधन में बड़ा बदलाव
यह नेटवर्क केवल सामान्य ब्रॉडबैंड तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सबसे बड़ा जमीनी असर उन सेक्टरों पर पड़ेगा जो कनेक्टिविटी के अभाव से जूझते हैं:
- डिफेंस और बॉर्डर आउटपोस्ट: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और एलओसी जैसी दुर्गम सीमाओं पर तैनात सुरक्षाबलों को चौबीसों घंटे सुरक्षित इनक्रिप्टेड लिंक मिलेगा।
- मैरीटाइम और एविएशन: गहरे समुद्र में भारतीय जहाजों, मछुआरों और वाणिज्यिक उड़ानों के भीतर निर्बाध इंटरनेट और कॉलिंग संभव होगी।
- डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) कॉलिंग: प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़ या भूकंप के समय जब जमीनी सेल्युलर टावर ठप हो जाते हैं, तब आम नागरिक सीधे सैटेलाइट से सिग्नल हासिल कर कॉल कर सकेंगे।
वर्तमान में यह परियोजना तकनीकी और विनियामक प्रस्ताव के स्तर पर है। उपग्रहों की ऑर्बिटल स्लॉटिंग और स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इसका जमीनी परीक्षण शुरू किया जाएगा, जो देश के टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर को एक नई ऊंचाई पर ले जा सकता है।








