देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी खजाने के प्रबंधन को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें उत्तराखंड कैग रिपोर्ट खुलासा (Uttarakhand CAG Report) के जरिए बताया गया है कि राज्य सरकार ने पिछले 19 वर्षों में करीब 55,000 करोड़ रुपये बिना विधानसभा की अनिवार्य मंजूरी के खर्च कर दिए हैं।
कैग ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 204 और 205 (1-बी) का सीधा उल्लंघन करार दिया है। ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2005-06 से ही यह परिपाटी चली आ रही है, जहां बजट के अतिरिक्त खर्च किए गए अनुदानों का सदन से नियमितीकरण नहीं कराया गया।
नियमों की अनदेखी और वित्तीय कुप्रबंधन
कैग की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2023 तक 48,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का नियमितीकरण लंबित था। ताजा आंकड़ों के अनुसार, केवल वित्तीय वर्ष 2023-24 में ही 7,300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि खर्च की गई, जिसके लिए विधानसभा से कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली गई।
लेखा परीक्षकों ने चेतावनी दी है कि बिना विधायी नियंत्रण के इतनी बड़ी राशि का खर्च होना राज्य की वित्तीय सेहत और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए चिंताजनक है। कई विभागों द्वारा बजट को निजी खातों में रखने और बिना उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) के धन जारी करने के मामले भी पकड़े गए हैं।

कुंभ मेले के बजट और जांच में धांधली
धार्मिक आयोजन हरिद्वार कुंभ 2021 भी कैग की रडार पर है। रिपोर्ट के अनुसार, कुंभ के लिए आवंटित 806 करोड़ रुपये में से मेला अधिकारी ने केवल 586 करोड़ रुपये ही जारी किए, जबकि 219 करोड़ रुपये का उपयोग ही नहीं हो सका। इसके अलावा, कुंभ के दौरान हुई कोविड जांचों में बड़े पैमाने पर अनियमितता की आशंका जताई गई है।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जरूरी दस्तावेज उपलब्ध न कराए जाने के कारण कैग ने भुगतान प्रक्रिया में गंभीर खामियां उजागर की हैं, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं।
राजस्व को चपत और जीएसटी में लापरवाही
सरकारी राजस्व की वसूली में भी भारी चूक देखने को मिली है। कैग ने राज्य की जीएसटी प्रणाली और इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के दावों पर सवाल उठाए हैं। जांच में सामने आया कि कई कारोबारियों को गलत तरीके से क्रेडिट का लाभ दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है।
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि यदि योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी और बजट के दुरुपयोग पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में राज्य पर कर्ज का बोझ और अधिक बढ़ सकता है।








