कोलकाता, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। पश्चिम बंगाल की सत्ता का रास्ता इस बार चाय की दुकानों से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग के उस ‘रबर’ से होकर गुजर रहा है जिसने वोटर लिस्ट से लाखों नाम साफ कर दिए हैं। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) ने ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी के बीच एक नई रार छेड़ दी है।
कोलकाता: बंगाल का सियासी मिजाज इस वक्त किसी हाई-वोल्टेज थ्रिलर जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने की SIR प्रक्रिया में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। रिपोर्ट्स की मानें तो इस कवायद में करीब 63 लाख नाम हटाए जा चुके हैं, जिन्हें ‘फर्जी’ या ‘संदिग्ध’ माना गया है। बीजेपी इसे ‘लोकतंत्र की शुद्धि’ कह रही है, तो टीएमसी इसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की साजिश करार दे रही है।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, करीब 4.98 लाख लोग सुनवाई के लिए पेश ही नहीं हुए, जिसके बाद उनके नाम काटने की प्रक्रिया तेज हुई है। इस बार कुल 294 सीटों पर होने वाले मुकाबले में जीत का आंकड़ा 148 है। टीएमसी जहां 2021 की 215 सीटों की बढ़त बरकरार रखना चाहती है, वहीं बीजेपी 77 से आगे बढ़कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचने की फिराक में है।

ममता बनर्जी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत ‘महिला वोटर्स’ को साधने के लिए बड़ा दांव चला है। राज्य सरकार ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की राशि में ₹500 का इजाफा कर दिया है। अब सामान्य वर्ग की महिलाओं को ₹1500 और अनुसूचित जाति/जनजाति की महिलाओं को ₹1700 सीधे बैंक खाते में मिल रहे हैं। बजट 2026-27 में इस योजना के लिए ₹26,700 करोड़ का भारी-भरकम प्रावधान किया गया है, जो दीदी की ‘प्रो-विमेन’ इमेज को और मजबूत कर रहा है।
सियासी भूगोल की बात करें तो उत्तर बंगाल की 68 सीटों पर बीजेपी आज भी मजबूत दिख रही है। हालांकि, दक्षिण बंगाल के 100 से ज्यादा सीटों वाले दुर्ग में सेंध लगाना भगवा दल के लिए अब भी टेढ़ी खीर है। दिलचस्प मोड़ मालदा और मुर्शिदाबाद में आ सकता है, जहाँ असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी और हुमायूं कबीर का नया मोर्चा टीएमसी के 30% मुस्लिम वोट बैंक में बंटवारे की कोशिश कर रहा है।
भ्रष्टाचार और ‘कट मनी’ के आरोपों के बीच ममता बनर्जी के पास एक बार फिर ‘बंगाली अस्मिता’ का ही सहारा है। दूसरी तरफ, बीजेपी बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के, प्रधानमंत्री मोदी के नाम और ‘भ्रष्टाचार मुक्त बंगाल’ के नारे पर दांव लगा रही है। 4 मई को जब नतीजे आएंगे, तब साफ होगा कि बंगाल की जनता ने ‘लक्ष्मी’ के भंडार पर भरोसा किया या ‘SIR’ के जरिए हुई वोटर लिस्ट की सफाई ने खेल पलट दिया।









