नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कोटद्वार के बहुचर्चित जिम संचालक दीपक कुमार उर्फ ‘मोहम्मद दीपक’ को तगड़ा कानूनी झटका दिया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकल पीठ ने दीपक के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने इस मामले में आरोपी की भूमिका को देखते हुए उसके खिलाफ ‘गैग ऑर्डर’ (Gag Order) भी जारी किया है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने दीपक द्वारा सोशल मीडिया पर लगातार दिए जा रहे बयानों और वीडियो पर कड़ी आपत्ति जताई। जस्टिस थपलियाल ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि एक आरोपी को जांच एजेंसी पर भरोसा करना चाहिए, न कि सोशल मीडिया पर ‘प्रवचन’ देकर मामले को सनसनीखेज बनाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक जांच लंबित है, दीपक सोशल मीडिया पर इस केस से जुड़ा कोई भी बयान या सामग्री साझा नहीं कर सकेंगे।
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब राज्य सरकार ने कोर्ट को सूचित किया कि दीपक ने तथ्यों को छिपाया है। सरकारी वकील ने बताया कि दीपक की शिकायत पर पहले ही पुलिस ने दो अलग FIR दर्ज की हैं और उसे 3 फरवरी से 13 मार्च 2026 तक सुरक्षा भी प्रदान की गई थी। कोर्ट ने दीपक द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच और अतिरिक्त सुरक्षा की मांग को ‘अनुचित’ करार देते हुए इसे जांच को प्रभावित करने की कोशिश बताया।
यह पूरा विवाद 26 जनवरी 2026 को कोटद्वार में शुरू हुआ था, जब दीपक ने एक मुस्लिम दुकानदार का पक्ष लेते हुए अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया था। इस घटना के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी दीपक से मुलाकात कर उनका समर्थन किया था। हालांकि, अब हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि एक ‘संदिग्ध आरोपी’ होने के नाते दीपक को कानून की प्रक्रिया का पालन करना होगा और जांच में सहयोग करना होगा।
कोटद्वार पुलिस ने दीपक कुमार (उर्फ मोहम्मद दीपक) के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है। पुलिस की चार्जशीट और FIR में मुख्य रूप से निम्नलिखित आरोप लगाए गए हैं:
- धारा 299 (BNS): धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना। (पुराने कानून IPC की धारा 295A के समान)।
- धारा 196 (BNS): विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना। (पुराने कानून IPC की धारा 153A के समान)।
- धारा 353(2) (BNS): सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से झूठी जानकारी या अफवाह फैलाना।
कोर्ट का रुख

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दीपक ने जिस तरह से भीड़ के सामने खुद को ‘मोहम्मद दीपक’ बताया और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित किया, उससे इलाके में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा। इसलिए FIR को शुरुआती स्तर पर रद्द करना कानूनन सही नहीं है।
गैग ऑर्डर (Gag Order)
गैग ऑर्डर एक ‘पूर्व-प्रतिबंध’ (Prior Restraint) आदेश है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में इसे इसलिए जरूरी समझा क्योंकि आरोपी (दीपक) कोर्ट की कार्यवाही और पुलिस जांच को ‘मीडिया ट्रायल’ में बदलने की कोशिश कर रहा था।
गैग ऑर्डर के तहत क्या पाबंदियां हैं?
- सोशल मीडिया बैन: दीपक अब फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब या एक्स (X) पर इस केस से जुड़ा कोई भी वीडियो या पोस्ट नहीं डाल सकते।
- मीडिया इंटरव्यू: वह किसी भी न्यूज़ चैनल या स्वतंत्र पत्रकार को इस केस की मेरिट पर इंटरव्यू नहीं दे सकते।
- सार्वजनिक भाषण: किसी भी सार्वजनिक सभा में इस कानूनी विवाद पर टिप्पणी करना प्रतिबंधित है।
यह आदेश क्यों दिया गया?
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने सुनवाई के दौरान ‘Fair Trial’ (निष्पक्ष सुनवाई) के सिद्धांत का हवाला दिया। कोर्ट का मानना है कि:
आरोपी लगातार वीडियो जारी कर जांच अधिकारियों पर दबाव बना रहा था।
यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है कि एक आरोपी खुद को ‘विक्टिम’ (पीड़ित) दिखाकर जनता की सहानुभूति बटोरने की कोशिश करे जबकि जांच अभी जारी है।
महत्वपूर्ण नोट: गैग ऑर्डर का उल्लंघन ‘अदालत की अवमानना’ (Contempt of Court) माना जाता है। यदि दीपक अब कोई भी भड़काऊ पोस्ट करते हैं, तो पुलिस उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज सकती है, भले ही उन्हें अभी तक कुछ राहत मिली हो।












