नई दिल्ली, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। वित्तीय लेनदेन और रिश्तों की मर्यादा के बीच अक्सर लोग भावनाओं में आकर एक ऐसी गलती कर बैठते हैं, जो उनके पूरे परिवार की आर्थिक सुरक्षा को दांव पर लगा देती है। बैंक या किसी वित्तीय संस्थान से कर्ज लेते समय किसी का ‘गारंटर’ बनना केवल कागजी खानापूर्ति नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी कानूनी बेड़ी है जो डिफॉल्ट की स्थिति में आपको सीधा अपराधी या कर्जदार बना देती है।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड (AOR) राजेश कुमार चौरसिया ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि गारंटर बनने से पहले इसके घातक परिणामों को समझना अनिवार्य है, क्योंकि एक बार हस्ताक्षर होने के बाद पीछे हटने का रास्ता लगभग बंद हो जाता है।
हस्ताक्षर नहीं, यह है सिर पर लिया गया बड़ा कर्ज
अक्सर लोग यह मान बैठते हैं कि लोन तो उनका दोस्त या रिश्तेदार ले रहा है, वे तो बस एक गवाह हैं। हकीकत इससे कोसों दूर है। जब आप लोन के कागजातों पर गारंटर के रूप में दस्तखत करते हैं, तो आप बैंक को यह लिखित वचन देते हैं कि यदि मुख्य कर्जदार पैसा नहीं लौटाता, तो उस पूरे कर्ज की पाई-पाई आप चुकाएंगे।
कानूनी शब्दावली में इसे ‘Joint and Several Liability’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि बैंक को यह चुनने का अधिकार है कि वह किससे वसूली करेगा। यदि कर्ज लेने वाला व्यक्ति फरार हो जाता है या हाथ खड़े कर देता है, तो बैंक बिना किसी देरी के आपके दरवाजे पर दस्तक देगा।
सिबिल स्कोर का कत्लेआम: बिना लोन लिए बन जाएंगे डिफॉल्टर
आज के दौर में क्रेडिट स्कोर यानी सिबिल (CIBIL) आपकी वित्तीय कुंडली है। लोन गारंटर बनते ही आपका पैन (PAN) नंबर उस लोन खाते से जुड़ जाता है। जैसे ही मुख्य कर्जदार एक भी ईएमआई (EMI) मिस करता है, उसका नकारात्मक प्रभाव केवल उसके नहीं, बल्कि आपके क्रेडिट स्कोर पर भी पड़ता है। बैंक इसकी रिपोर्ट तुरंत क्रेडिट ब्यूरो को भेजते हैं।
नतीजा यह होता है कि जब आप भविष्य में अपने घर, कार या बच्चों की पढ़ाई के लिए लोन लेने जाएंगे, तो बैंक आपका आवेदन खारिज कर देगा क्योंकि रिकॉर्ड में आप एक ‘डिफॉल्टेड लोन’ के भागीदार दिखेंगे।
प्रॉपर्टी की नीलामी और कानूनी शिकंजा
बैंकों के पास वसूली के लिए बेहद सख्त कानूनी अधिकार होते हैं। यदि मुख्य कर्जदार की संपत्ति से बैंक का बकाया पूरा नहीं होता, तो कानून गारंटर की संपत्ति पर कब्जा करने की पूरी छूट देता है। लोन एग्रीमेंट में स्पष्ट लिखा होता है कि मूल राशि के साथ-साथ ब्याज, जुर्माना और कानूनी खर्च की वसूली गारंटर से की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में आपकी बचत, बैंक बैलेंस और यहां तक कि आपके घर की नीलामी तक की नौबत आ सकती है। सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) जैसे कानूनों के तहत बैंकों को यह पावर मिली हुई है कि वे गारंटर को भी उतना ही जिम्मेदार ठहराएं जितना कि वास्तविक कर्जदार को।
धोखे से बचने के लिए ये सावधानियां हैं जरूरी
रिश्तेदारी निभाने के चक्कर में खुद को बर्बाद करने से बेहतर है कि आप गारंटर बनने से पहले कठोर जांच-पड़ताल करें। केवल उस व्यक्ति की गारंटी लें जिसकी आर्थिक हैसियत और नियत पर आपको 100% भरोसा हो। गारंटर बनने से पहले उसकी पुरानी लोन हिस्ट्री और वर्तमान कमाई के जरिया जरूर जांचें।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर बहुत जरूरी हो, तो केवल उतनी ही राशि की गारंटी लें जितनी आप खुद चुकाने की क्षमता रखते हों। किसी के दबाव या ‘बस एक साइन ही तो है’ जैसी बातों में आकर अपनी मेहनत की कमाई और संपत्ति को जोखिम में डालना बड़ी नासमझी साबित हो सकती है।












