केंद्रीय कर्मचारियों और लगभग 68 लाख पेंशनभोगियों के वित्तीय भविष्य को तय करने वाले आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है। इस बार घमासान सिर्फ वेतन वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि पेंशन की गणना और उसकी कट-ऑफ तारीख को लेकर कर्मचारी संगठन पूरी तरह लामबंद हो गए हैं।
ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलॉइज फेडरेशन (AIDEF) और नेशनल काउंसिल ऑफ दी जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) जैसे शीर्ष संगठनों ने सीधे तौर पर मांग उठाई है कि आयोग के टर्म ऑफ रेफरेंस (Terms of Reference) में तुरंत संशोधन किया जाए, ताकि किसी भी पूर्व कर्मचारी के साथ भेदभाव न हो।
कट-ऑफ तारीख पर टकराव
मौजूदा व्यवस्था और पूर्व के नियमों के मुताबिक अमूमन नए वेतन आयोग की सिफारिशें एक निर्धारित तारीख से लागू मानी जाती हैं। वर्तमान चर्चाओं के आधार पर जो कर्मचारी 1 जनवरी 2026 या उसके बाद सेवानिवृत्त होंगे, उन्हें सीधे तौर पर इस नए पे-मैट्रिक्स का लाभ मिलने का अनुमान है।
लेकिन रेलवे मेल सर्विस (RMS) और रक्षा कर्मियों से जुड़ी यूनियनों ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया है। उनका तर्क सीधा है—सेवानिवृत्ति की तारीख के आधार पर पेंशनर्स को दो अलग-अलग वर्गों में नहीं बांटा जा सकता।
संगठनों का कहना है कि जो कर्मचारी 1 जनवरी 2026 से पहले रिटायर हो चुके हैं, उन्हें भी पूर्ण रूप से 8वें वेतन आयोग के दायरे में शामिल किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार यदि टर्म ऑफ रेफरेंस (ToR) में इस बिंदु को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं करती है, तो पुराने और नए पेंशनर्स के बीच एक चौड़ी वित्तीय खाई बन जाएगी। इससे पे-पैरिटी का बुनियादी सिद्धांत प्रभावित होगा।
आखिरी सैलरी का 67% पेंशन
पेंशन निर्धारण के फॉर्मूले में इस बार ऐतिहासिक फेरबदल की मांग की गई है। वर्तमान में पेंशन आमतौर पर अंतिम आहरित मूल वेतन का 50 फीसदी होती है।
इस व्यवस्था को बदलने के लिए NC-JCM और AIDEF ने एक सुर में मांग रखी है:
- पूर्ण पेंशन को अंतिम मूल वेतन का 67 प्रतिशत निर्धारित किया जाए।
- पारिवारिक पेंशन (फैमिली पेंशन) को बढ़ाकर कम से कम 50 फीसदी तय किया जाए।
दूसरी तरफ, भारत पेंशनर्स समाज ने जीवनयापन की बढ़ती लागत को देखते हुए न्यूनतम पेंशन सीधे 45,000 रुपये प्रति माह तय करने की वकालत की है।
तुलना के तौर पर देखें तो सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम पेंशन 9,000 रुपये और अधिकतम सीमा 1,25,000 रुपये तय की थी। यदि यूनियनों की 45 हजार वाली मांग पर आंशिक सहमति भी बनती है, तो यह पेंशनर्स के लिए अब तक की सबसे बड़ी राहत साबित होगी।
फिटमेंट फैक्टर का गणित
पेंशन रिवीजन का पूरा दारोमदार फिटमेंट फैक्टर (Fitment Factor) पर टिका हुआ है। आयोग किस गुणक की सिफारिश करता है, उसी से तय होगा कि बैंक खाते में कितनी रकम आएगी।
यदि आयोग 2.1 का फिटमेंट फैक्टर अपनाता है:
- लेवल-5: न्यूनतम पेंशन 30,660 रुपये।
- लेवल-6: 37,170 रुपये।
- लेवल-7: 47,145 रुपये।
- लेवल-8: 49,980 रुपये।
- लेवल-9: 55,755 रुपये।
यदि इसे बढ़ाकर 2.28 किया जाता है, तो लेवल-5 पर 33,288 रुपये, लेवल-6 पर 40,356 रुपये, लेवल-7 पर 51,186 रुपये और लेवल-8 पर 54,264 रुपये मिलेंगे। इसी फॉर्मूले पर लेवल-9 कर्मियों की पेंशन बढ़कर 60,534 रुपये हो जाएगी।
सबसे ज्यादा उम्मीद 2.57 के फिटमेंट फैक्टर से बंधी है। 7वें वेतन आयोग के समय भी इसी गुणक को आधार बनाया गया था। यदि 8वें वेतन आयोग में भी 2.57 का पैमाना लागू रहा, तो लेवल-5 के पूर्व कर्मचारी को कम से कम 37,522 रुपये और लेवल-9 के रिटायर कर्मचारी को 68,234 रुपये की मासिक पेंशन मिलना तय माना जा रहा है।
फिलहाल गेंद केंद्र सरकार के पाले में है कि वह टर्म ऑफ रेफरेंस को अंतिम रूप देते समय कर्मचारी यूनियनों के इन प्रस्तावों को किस हद तक हरी झंडी दिखाती है।




