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Uttarakhand SIR की तैयारी में बीएलओ परेशान, 2003 के वोटर ही नहीं मिल रहे

Published on: December 14, 2025 10:17 PM
Uttarakhand SIR की तैयारी में बीएलओ परेशान, 2003 के वोटर ही नहीं मिल रहे
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उत्तराखंड में चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया, जिसे एसआईआर कहा जाता है, जल्द ही शुरू होने वाली है। यह प्रक्रिया मतदाता सूचियों को साफ-सुथरा बनाने के लिए महत्वपूर्ण है, ताकि चुनावों में कोई गड़बड़ी न हो। लेकिन तैयारी के इस चरण में ही बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।

खासकर राज्य के मैदानी इलाकों में पुरानी वोटर लिस्ट से लोगों को ट्रैक करना एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। यह काम इसलिए जरूरी है क्योंकि साफ-सुथरी वोटर लिस्ट लोकतंत्र की मजबूती के लिए बुनियाद होती है, और इसमें कोई लापरवाही चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

बीएलओ की भूमिका और राज्यव्यापी तैयारी

चुनाव आयोग ने पूरे उत्तराखंड में लगभग 11,700 से ज्यादा मतदान केंद्रों पर बीएलओ को जिम्मेदारी सौंपी है। इन अधिकारियों का मुख्य काम 2003 की पुरानी मतदाता सूची को मौजूदा स्थिति से मिलान करना है। यह मैपिंग प्रक्रिया वोटर लिस्ट को अपडेट करने का पहला कदम है, जिसमें पुराने नामों को जांचा जाता है कि वे अब भी वैध हैं या नहीं।

पहाड़ी जिलों में यह काम सुचारू रूप से चल रहा है, जहां आबादी कम घुमावदार है और लोग ज्यादातर स्थानीय होते हैं। लेकिन मैदानी क्षेत्रों में स्थिति अलग है, जहां बीएलओ को पुराने वोटर्स का पता लगाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं।

मैदानी जिलों में क्यों हो रही परेशानी

देहरादून, हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में बीएलओ दिन-रात एक करके भी कई नामों का सुराग नहीं लगा पा रहे हैं। इन इलाकों में रोजगार की तलाश में देश के कोने-कोने से लोग आते हैं। यहां फैक्टरियां, उद्योग और अन्य क्षेत्रों में नौकरियां मिलती हैं, जिसकी वजह से लोग कुछ समय के लिए बसते हैं और वोटर आईडी बनवा लेते हैं।

लेकिन जैसे ही बेहतर अवसर मिलते हैं, वे दूसरे जगहों पर चले जाते हैं। नतीजा यह कि पुरानी लिस्ट में नाम तो दर्ज हैं, लेकिन असल में लोग वहां नहीं मिलते। चुनाव आयोग इस पर करीब से नजर रख रहा है, ताकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तरह यहां बड़े पैमाने पर वोटर्स के नाम काटने की नौबत न आए। वहां हाल ही में ऐसी स्थिति बनी थी, जिससे काफी विवाद हुआ और चुनावी विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

प्रवास की समस्या और इसका असर

उत्तराखंड के मैदानी हिस्सों में प्रवास एक बड़ी हकीकत है। राज्य की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन, उद्योग और कृषि पर टिकी है, जो बाहर से आने वाले मजदूरों और पेशेवरों पर निर्भर करती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन जिलों में सालाना लाखों लोग आते-जाते रहते हैं। ऐसे में वोटर लिस्ट को अपडेट रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

अगर मैपिंग सही से न हुई, तो चुनावों में फर्जी वोटिंग या मतदाताओं की अनुपस्थिति जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि एसआईआर से पहले ही ज्यादातर काम निपटा लिया जाए, ताकि मुख्य प्रक्रिया में कोई रुकावट न आए।

मैपिंग की मौजूदा स्थिति

अभी तक पूरे राज्य में 2003 की लिस्ट से मैपिंग का लगभग 55 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। पहाड़ी जिलों में यह प्रगति 70 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो स्थानीय आबादी की स्थिरता की वजह से संभव हुआ। वहीं मैदानी इलाकों में यह आंकड़ा काफी कम है, जहां प्रवास की दर ऊंची होने से चुनौतियां ज्यादा हैं।

अगले साल की शुरुआत में एसआईआर शुरू होने की संभावना है, और चुनाव आयोग चाहता है कि तैयारी इतनी मजबूत हो कि बाद में कोई जल्दबाजी न करनी पड़े। यह प्रक्रिया न केवल वोटर लिस्ट को विश्वसनीय बनाएगी, बल्कि मतदाताओं को भी अपने अधिकारों के बारे में जागरूक करेगी।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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