उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक वरिष्ठ पत्रकार की मौत ने पूरे शहर को हिला दिया है। पंकज मिश्रा नाम के इस अनुभवी पत्रकार का निधन अचानक हुआ, लेकिन उनके परिवार का मानना है कि यह कोई सामान्य मौत नहीं थी। पुलिस ने अब इस मामले को गंभीरता से लेते हुए हत्या का केस दर्ज कर लिया है। आइए जानते हैं कि क्या हुआ था उस रात और क्यों परिवार अब न्याय की मांग कर रहा है।
घटना की शुरुआत, घर में घुसकर हमला
पिछले हफ्ते, 15 दिसंबर की रात को पंकज मिश्रा अपने घर में आराम कर रहे थे। वे दून विहार जाखन इलाके में अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ रहते थे। रात करीब 10 बजे अमित सहगल नाम का शख्स कुछ साथियों के साथ उनके घर पहुंचा। परिवार के मुताबिक, ये लोग बिना किसी वजह के गुस्से में थे और उन्होंने पंकज पर हमला बोल दिया। सीने और पेट पर लात-घूंसे मारे गए, जिससे पंकज को गंभीर चोटें आईं। हमलावरों को पता था कि पंकज दिल और लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे, और उन्होंने इसी कमजोरी का फायदा उठाया।
हमले के दौरान क्या-क्या हुआ?
हमले में इतनी हिंसा हुई कि पंकज के मुंह से खून आने लगा। हमलावरों ने उनका मोबाइल फोन छीन लिया ताकि वे मदद न मांग सकें। जब पत्नी लक्ष्मी ने पुलिस को फोन करने की कोशिश की, तो उनके फोन को भी छीन लिया गया और उनके साथ बदतमीजी की गई। इसके बाद हमलावर भाग निकले। पंकज ने किसी राहगीर के फोन से पुलिस को सूचना दी, लेकिन उस वक्त डर और चोट की वजह से वे रात में कोई कार्रवाई नहीं कर पाए। वे सोचे कि सुबह सब संभाल लेंगे, लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिखा था।
अचानक बिगड़ी तबीयत और मौत
अगली सुबह, 16 दिसंबर को तड़के 3 बजे पंकज को तेज दर्द हुआ। उन्होंने पत्नी को आवाज दी, लेकिन बिस्तर से उठते ही बेहोश होकर गिर पड़े। पड़ोसियों की मदद से एम्बुलेंस बुलाई गई और उन्हें दून अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह खबर फैलते ही परिवार सदमे में आ गया। पंकज के छोटे भाई अरविंद, जो मुंबई में रहते हैं, तुरंत देहरादून पहुंचे और मामले की गहराई से जांच की मांग की।
दोबारा पोस्टमॉर्टम क्यों जरूरी?
मंगलवार को पंकज का पहला पोस्टमॉर्टम हुआ, लेकिन परिवार को इस पर शक था। अरविंद ने एसएसपी अजय सिंह से मिलकर दोबारा जांच की अपील की। बुधवार को यह प्रक्रिया दोहराई गई। परिवार का कहना है कि आरोपी अमित सहगल का पुराना इतिहास है, जहां वे डॉक्टरों को ब्लैकमेल करते रहे हैं। ऐसे में पहली रिपोर्ट में गड़बड़ी की आशंका थी।
भारत में पत्रकारों पर हमलों के मामले बढ़ते जा रहे हैं—2023 में रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के मुताबिक, भारत में 28 पत्रकारों पर हमले हुए, जो प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हैं। इस मामले में भी पुलिस को सतर्क रहना होगा।
पुलिस की कार्रवाई और कानूनी पहलू
एसपी सिटी प्रमोद कुमार ने बताया कि अरविंद की शिकायत पर राजपुर थाने में केस दर्ज किया गया। आरोपी अमित सहगल और उनके साथियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103 (हत्या), 304 (गैर-इरादतन हत्या), 333 (गंभीर चोट पहुंचाना) और 352 (हमला) के तहत मुकदमा चल रहा है। पुलिस हर कोण से जांच कर रही है और जल्द ही गिरफ्तारियां हो सकती हैं। यह धाराएं गंभीर अपराधों से जुड़ी हैं, जहां दोषी को लंबी सजा हो सकती है। परिवार को उम्मीद है कि न्याय मिलेगा और ऐसे हमलों पर रोक लगेगी।
पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल
पंकज मिश्रा जैसे पत्रकार समाज की आवाज होते हैं। उनकी मौत ने एक बार फिर साबित किया कि भारत में मीडिया पेशेवरों की सुरक्षा कितनी जरूरी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में उत्तराखंड में हिंसक अपराधों में 10% बढ़ोतरी हुई, जिसमें घरेलू हमले भी शामिल हैं। इस घटना से सबक लेते हुए, सरकार और पुलिस को प्रेस की रक्षा के लिए मजबूत कदम उठाने चाहिए। क्या यह मामला एक बड़ा बदलाव लाएगा? समय बताएगा।















