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Delhi Dehradun Expressway : 2.5 घंटे का सफर और बीच में खड़ा दो मंजिला मकान; दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी बाधा

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के लोनी (गाजियाबाद) खंड पर एक दो-मंजिला मकान मुख्य रैंप के निर्माण में बड़ी बाधा बन गया है, जिससे ट्रैफिक जाम की आशंका बढ़ गई है। 1998 से चले आ रहे इस कानूनी विवाद के कारण NHAI को वैकल्पिक संकरा रास्ता बनाना पड़ा है, जबकि मामला फिलहाल कोर्ट में लंबित है।

Delhi Dehradun Expressway : 2.5 घंटे का सफर और बीच में खड़ा दो मंजिला मकान; दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी बाधा

HIGHLIGHTS

  • 28 साल पुराना विवाद: किसान परिवार और आवास विकास परिषद के बीच 1998 से मुआवजा विवाद जारी।
  • डिजाइन में बदलाव: मुख्य रैंप की जगह NHAI ने फिलहाल पीछे से पतली सर्विस लेन जैसा रास्ता निकाला।
  • जाम का खतरा: संकरा रास्ता होने के कारण देहरादून से आने वाले ट्रैफिक के फंसने की आशंका।

गाजियाबाद, 15 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)

Delhi Dehradun Expressway : दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है, लेकिन गाजियाबाद के लोनी स्थित मंडोला गांव में एक दो-मंजिला मकान इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। यह मकान ठीक उस जगह खड़ा है जहां एक्सप्रेसवे का मुख्य रैंप बनना प्रस्तावित है।

28 साल पुराने एक कानूनी विवाद की वजह से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) इस जमीन का अधिग्रहण नहीं कर पाया है, जिसके चलते एक्सप्रेसवे के इस हिस्से में ट्रैफिक सुचारू रखने के लिए अस्थायी और संकरा रास्ता तैयार किया गया है।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद की जड़ें साल 1998 में छिपी हैं, जब उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने ‘मंडोला आवास योजना’ के लिए भूमि अधिग्रहण शुरू किया था। उस दौरान वीरसेन सरोहा नामक किसान ने अपनी जमीन और घर देने से इनकार कर दिया था। परिवार का दावा है कि शुरुआत में इस संपत्ति को अधिग्रहण से बाहर रखा गया था, लेकिन बाद में इसे योजना में शामिल कर लिया गया।

किसान ने पुरानी दरों पर मुआवजा लेने के बजाय इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। तब से यह मामला कानूनी दांव-पेच में फंसा है और अब परिवार की नई पीढ़ी इस लड़ाई को लड़ रही है।

एक्सप्रेसवे के डिजाइन पर असर

इस विवादित मकान के कारण एक्सप्रेसवे का मुख्य रैंप अधूरा रह गया है। यह रैंप न केवल मुख्य मार्ग को जोड़ता है, बल्कि ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (EPE) के साथ बनने वाले इंटरचेंज के लिए भी महत्वपूर्ण है। जमीन न मिलने के कारण अधिकारियों ने घर के पीछे से एक वैकल्पिक रास्ता निकाला है।

हालांकि, यह रास्ता मूल डिजाइन की तुलना में काफी संकरा है और एक सिंगल सर्विस लेन की तरह काम करेगा। जानकारों का मानना है कि देहरादून से दिल्ली की ओर आने वाले वाहनों के लिए यह हिस्सा ‘बॉटलनेक’ बन सकता है, जिससे सफर के समय में बढ़ोतरी और जाम की स्थिति पैदा होगी।

परिवार का तर्क और कोर्ट का रुख

मकान मालिक के परिजनों का कहना है कि जिस मूल आवास योजना के लिए जमीन ली जा रही थी, वह कभी पूरी ही नहीं हुई। ऐसे में उस जमीन का इस्तेमाल अब एक्सप्रेसवे जैसे दूसरे प्रोजेक्ट के लिए करना उनके साथ अन्याय है। परिवार की मांग है कि यदि अधिग्रहण करना ही है, तो मौजूदा बाजार दरों के हिसाब से मुआवजा दिया जाए।

यह मामला साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था। शीर्ष अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस विवाद पर जल्द से जल्द अंतिम फैसला सुनाने का निर्देश दिया था। फिलहाल, एक्सप्रेसवे के संचालन की तैयारी पूरी है, लेकिन इस एक मकान पर टिकी अदालत की नजरें यह तय करेंगी कि दिल्ली-देहरादून का सफर कितना निर्बाध होगा।


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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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