अगरतला, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। त्रिपुरा हाई कोर्ट ने फैमिली पेंशन के एक बेहद जटिल मामले में व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की मृत्यु के समय उसकी बेटी का तलाक नहीं हुआ था, तो वह बाद में मिलने वाली पेंशन की हकदार नहीं हो सकती। जस्टिस एस दत्ता पुरकायस्थ की पीठ ने इस संबंध में दायर एक याचिका को खारिज करते हुए ‘त्रिपुरा स्टेट सिविल सर्विस (पेंशन) रूल्स’ की सख्त व्याख्या की है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि पेंशन नियमों के मुताबिक, विवाहित बेटी को परिवार की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। नियम केवल उन अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा बेटियों को सुरक्षा देते हैं जिनका स्टेटस पिता की मृत्यु के समय स्पष्ट था। इस मामले में याचिकाकर्ता और उसके पति दशकों से अलग रह रहे थे, लेकिन कानूनी रूप से उनके बीच तलाक पिता की मौत के बाद हुआ।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ता के पिता अगरतला म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) में कार्यरत थे। रिटायरमेंट के बाद उन्हें नियमित पेंशन मिल रही थी, लेकिन 2 दिसंबर 2018 को उनका निधन हो गया। पिता की मौत के करीब तीन साल बाद यानी 2021 में महिला को अदालत से आधिकारिक तौर पर तलाक मिला। इसी आधार पर उसने म्यूनिसिपल अथॉरिटी से फैमिली पेंशन में हिस्सेदारी की मांग की थी।

याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि शादी के कुछ ही दिनों बाद उसके पति ने उसे छोड़ दिया था और वह पिछले 40 वर्षों से अपने पिता के घर पर ही रह रही थी। वह पूरी तरह अपने पिता की आय पर निर्भर थी। हालांकि, म्यूनिसिपल अथॉरिटी ने उसके आवेदन को यह कहकर ठुकरा दिया कि पिता की मृत्यु के समय वह विधवा या तलाकशुदा की श्रेणी में नहीं आती थी।
हाई कोर्ट ने इस तर्क को सही ठहराते हुए कहा कि यह निर्णय किसी भी तरह से भेदभावपूर्ण नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका नियमों को केवल लागू कर सकती है, उनमें अपनी ओर से बदलाव नहीं कर सकती। चूंकि पिता की मौत के समय महिला का वैवाहिक दर्जा बरकरार था, इसलिए वह नियमों के घेरे से बाहर हो गई।
त्रिपुरा सिविल सेवा नियम 2017 का नियम 8 स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है कि परिवार के कौन से सदस्य पेंशन के पात्र होंगे। अदालत ने टिप्पणी की कि भले ही स्थिति सहानुभूति वाली हो, लेकिन कानूनी मापदंडों के अनुसार शादीशुदा बेटी को उसके पिता की पेंशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।









