रतलाम, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारत के मंदिरों में आमतौर पर मिश्री या लड्डू का प्रसाद मिलता है, लेकिन मध्य प्रदेश के रतलाम में स्थित मां महालक्ष्मी का दरबार इस मामले में सबसे जुदा है।
माणकचौक इलाके में स्थित इस प्राचीन मंदिर (Ratlam Mahalaxmi Mandir) में श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में सोने-चांदी के सिक्के और जेवर दिए जाते हैं।
दिवाली के महापर्व पर यहाँ का नजारा किसी कुबेर के खजाने जैसा होता है। पूरे मंदिर परिसर को फूलों से नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये की नकदी और बेशकीमती आभूषणों से सजाया जाता है।
दीवारों से लेकर छत तक, हर तरफ नोटों की लड़ियाँ और सोने के हार चमकते नजर आते हैं। इस परंपरा की जड़ें दशकों पुरानी हैं। पूर्व समय में यहाँ के तत्कालीन राजा और रियासतदार अपनी सुख-समृद्धि के लिए मंदिर में जेवर और नकदी चढ़ाते थे।
समय बीतने के साथ यह जन-परंपरा बन गई। अब आम लोग भी धनतेरस और दिवाली के मौके पर अपनी गहने और नकदी माता के चरणों में इस विश्वास के साथ रखते हैं कि इससे उनके धन में सालभर बरकत रहेगी।
प्रसाद वितरण की प्रक्रिया बेहद व्यवस्थित है। भक्तों द्वारा चढ़ाए गए सामान का बाकायदा रजिस्टर में हिसाब-किताब दर्ज किया जाता है और उन्हें एक रसीद या टोकन दिया जाता है।
दिवाली के बाद, भाईदूज के आसपास यह चढ़ावा भक्तों को वापस लौटा दिया जाता है। भक्त इसे ‘महालक्ष्मी का प्रसाद’ मानकर अपने घर की तिजोरी में रखते हैं। मान्यता है कि इस प्रसाद को कभी खर्च या बेचा नहीं जाता।
चूंकि मंदिर में करोड़ों की संपत्ति जमा होती है, इसलिए सुरक्षा के इंतजाम किसी बैंक के स्ट्रॉन्ग रूम जैसे होते हैं। पूरे मंदिर परिसर में चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं और हथियारबंद पुलिस बल की तैनाती रहती है। बिना सघन चेकिंग के किसी को भी गर्भगृह की ओर बढ़ने की अनुमति नहीं दी जाती।










