पहाड़ों की रानी मसूरी जाने वाले रास्ते पर कुठाल गेट के पास एक ऐसा शिवालय है, जिसकी साख और नियम कायदे किसी भी अन्य हिंदू मंदिर से बिल्कुल जुदा हैं।
हम बात कर रहे हैं (Prakasheshwar Mahadev Mandir Dehradun) श्री प्रकाशेश्वर महादेव मंदिर की। यह मंदिर सिर्फ अपनी भव्यता के लिए नहीं, बल्कि अपनी उस जिद के लिए जाना जाता है जिसे सुनकर पहली बार में यकीन करना मुश्किल है।
यहां आप भगवान को एक धेला भी नहीं चढ़ा सकते। मंदिर प्रबंधन का स्पष्ट मानना है कि जो कुछ हमारे पास है वह महादेव का ही दिया हुआ है, तो फिर उन्हें क्या दान करना?
‘नो-डोनेशन’ का ऐसा सख्त पहरा
आम तौर पर मंदिरों की आय का स्रोत भक्तों का दान होता है, लेकिन प्रकाशेश्वर महादेव में मामला उलटा है। मंदिर के प्रवेश द्वार से लेकर गर्भगृह तक, जगह-जगह सूचना पट्ट लगे हैं जिन पर साफ लिखा है कि दान देना सख्त मना है।
यहां तक कि मंदिर के बाहर या अंदर कोई भी ऐसी दुकान नहीं है जो प्रसाद या फूल बेचती हो। खास बात यह है कि यह मंदिर किसी ट्रस्ट द्वारा नहीं बल्कि एक निजी व्यक्ति द्वारा संचालित किया जाता है।
इसके बावजूद, यहां व्यवस्थाएं किसी बड़े कॉर्पोरेट इवेंट से कम नहीं होतीं। श्रद्धालुओं को निःशुल्क चाय पिलाई जाती है और रोज भंडारा चलता है।
स्फटिक शिवलिंग की अलौकिक आभा
मंदिर की वास्तुकला गहरे लाल रंग की है, जो पहाड़ों की हरियाली के बीच दूर से ही चमकती है। इसके मुख्य आकर्षण की बात करें तो वह है ‘स्फटिक शिवलिंग’।

मान्यताओं के अनुसार, स्फटिक के शिवलिंग की पूजा से मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा कई गुना बढ़ जाती है।
लाखों साल पुराने बताए जाने वाले इस हिम-क्रिस्टल शिवलिंग के दर्शन के लिए सावन और महाशिवरात्रि पर पैर रखने की जगह नहीं होती।
1000 साल पुराना इतिहास और आधुनिक व्यवस्था
भले ही मंदिर की वर्तमान इमारत आधुनिक और चमकदार नजर आती हो, लेकिन स्थानीय जानकारों का कहना है कि इस स्थान का धार्मिक महत्व सदियों पुराना है। कुछ रिपोर्ट्स इसे 1000 साल पुरानी विरासत से जोड़ती हैं।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि मंदिर के भीतर फोटोग्राफी पूरी तरह प्रतिबंधित है। सुरक्षा और मर्यादा का इतना ख्याल रखा जाता है कि कैमरों की नजर से दूर रहकर भक्त शांति से ध्यान लगा सकें।
मंदिर के ऊपरी हिस्से पर बने कई त्रिशूल इसकी पहचान को और भी प्रभावशाली बनाते हैं।















