नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने वैश्विक अशांति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि दुनिया इस समय एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पिछले दो सहस्राब्दियों में दुनिया ने शांति के लिए कई वैचारिक प्रयोग किए, लेकिन स्वार्थ और शक्ति के प्रदर्शन की वजह से ये सभी प्रयास विफल साबित हुए हैं।
शुक्रवार को नागपुर में विश्व हिंदू परिषद के नए कार्यालय की आधारशिला रखने के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए भागवत ने वर्तमान भू-राजनीतिक स्थितियों पर कड़ा प्रहार किया।
उन्होंने कहा कि आज भी धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और ऊंच-नीच जैसी कुरीतियां समाज में मौजूद हैं, जो संघर्षों को हवा दे रही हैं। भागवत के अनुसार, पश्चिमी विचारधारा ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (Survival of the Fittest) में विश्वास करती है, जो अंततः टकराव पैदा करता है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो RSS प्रमुख का यह बयान ऐसे समय में आया है जब रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व के संकटों के बीच वैश्विक समुदाय समाधान के लिए भारत की ओर देख रहा है।
भागवत ने जोर दिया कि भारत की प्रकृति ‘अस्तित्व के संघर्ष’ के बजाय ‘अस्तित्व की एकता’ पर आधारित है। उन्होंने आधुनिक विज्ञान का हवाला देते हुए कहा कि आज का वैज्ञानिक जगत भी धीरे-धीरे उसी सत्य की ओर बढ़ रहा है जिसे भारत के पूर्वजों ने सदियों पहले जान लिया था।
संघ प्रमुख ने कड़े शब्दों में कहा कि धर्म केवल किताबी ज्ञान या शास्त्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह व्यक्ति के दैनिक व्यवहार और आचरण में झलकना चाहिए।
उनके अनुसार, स्थायी शांति केवल एकता, अनुशासन और धर्म के मार्ग पर चलकर ही संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्व को विनाश से बचाने के लिए अब केवल भारत के आध्यात्मिक और मानवतावादी ज्ञान की ही शरण लेनी होगी।










