कोडागु, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। कर्नाटक के कोडागु जिले की ताड़ियंडमोल पहाड़ियों में चार दिनों तक लापता रहीं 36 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल जीएस शरण्या को आखिरकार सुरक्षित बचा लिया गया है। केरल की रहने वाली शरण्या ने घने जंगलों, जंगली जानवरों के खौफ और कड़ाके की ठंड के बीच जिस तरह अपनी जान बचाई, वह उनकी अद्भुत मानसिक इच्छाशक्ति का प्रमाण है।
शरण्या 2 अप्रैल को ट्रेकिंग के दौरान अपने ग्रुप से अचानक बिछड़ गई थीं। वह नेपोकलु से लगभग 10 किलोमीटर दूर काक्काब्बे गांव के एक होमस्टे में अकेले रुकी हुई थीं। ट्रेकिंग शुरू करने के कुछ ही देर बाद वह रास्ता भटक गईं और जंगल के उस हिस्से में पहुंच गईं जहां मोबाइल का नेटवर्क पूरी तरह गायब था।
जब वह जंगल की गहराइयों में फंसीं, तब उनके पास महज आधा लीटर पानी की एक बोतल थी। जल्द ही उनके मोबाइल फोन की बैटरी भी खत्म हो गई, जिससे उनका बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह कट गया। इस इलाके में जंगली हाथियों का भारी आतंक रहता है और ऊपर से मानसून से पहले की भारी बारिश ने उनकी मुश्किलों को कई गुना बढ़ा दिया था।
शरण्या ने बताया कि शुरुआती डर के बाद उन्होंने खुद को शांत रखा और चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी। दूसरे दिन वह पहाड़ियों के ऊंचे हिस्से की ओर चढ़ गईं ताकि कोई ड्रोन या रेस्क्यू टीम उन्हें दूर से देख सके। हालांकि, तीसरे दिन हुई मूसलाधार बारिश ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। वह पूरी रात भीगी रहीं और कड़ाके की ठंड के कारण एक पल के लिए भी सो नहीं सकीं।
भूख और प्यास से जूझते हुए शरण्या ने चौथे दिन एक समझदारी भरा फैसला लिया। वह एक पहाड़ी नाले के पास स्थित बड़ी चट्टान के पास जाकर ठहर गईं। यहां उन्हें पीने के लिए पानी उपलब्ध था और खुली जगह होने के कारण रेस्क्यू टीम के लिए उन्हें ढूंढना आसान था। उन्होंने बताया कि खाने के नाम पर उनके पास कुछ नहीं था, लेकिन उन्होंने उम्मीद कभी नहीं छोड़ी।
इस बीच, प्रशासन ने उन्हें ढूंढने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। वन विभाग, पुलिस की एंटी-नक्सल स्क्वाड (ANS), स्थानीय आदिवासी समुदाय और स्वयंसेवकों की कुल 9 अलग-अलग टीमें जंगल के चप्पे-चप्पे को छान रही थीं। चौथे दिन दोपहर में रेस्क्यू टीम को वह नाले के किनारे चट्टान पर बैठी मिलीं।
अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद शरण्या अब अपने परिवार के साथ हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उन्हें खुद नहीं पता कि उस कठिन समय में उन्हें डर क्यों नहीं लगा। ताड़ियंडमोल जैसे चुनौतीपूर्ण ट्रेकिंग रूट पर यह घटना सुरक्षा मानकों और स्थानीय गाइड की अनिवार्यता पर एक बड़ी चेतावनी भी है।










