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शादी के बाद महिलाओं को निभानी पड़ती है हैरान कर देने वाली परंपरा, 5 दिन तक नहीं पहनते कपड़े

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Gudiya Sagar Updated Fri, 07 Aug 2026 12:08 PM IST

हिमाचल प्रदेश की मणिकर्ण घाटी में स्थित पीणी गांव अपनी सदियों पुरानी लोक परंपराओं के लिए जाना जाता है। सावन और भादो के दौरान पांच दिनों के लिए गांव में कई विशेष नियम और सामाजिक बंदिशें लागू होती हैं।

Himachal Pradesh Tradition

Himachal Pradesh Tradition : हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति, धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं हैं।

उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक, कई स्थानों पर ऐसे रिवाज देखने को मिलते हैं जो वहां की स्थानीय जीवन शैली और ऐतिहासिक कहानियों से गहरे जुड़े हुए हैं।

ऐसा ही एक खास रिवाज हिमाचल प्रदेश की मणिकर्ण घाटी में स्थित पीणी गांव का है।

पीणी गांव में सावन के महीने में पांच दिनों का एक विशेष समय आता है, जब गांव की महिलाएं और पुरुष अत्यंत सादगी और कड़े नियमों का पालन करते हैं।

इस अवधि के दौरान महिलाएं सामान्य वस्त्रों का त्याग कर पारंपरिक ऊनी वस्त्र धारण करती हैं और बाहरी आडंबरों से पूरी तरह दूर रहती हैं।

क्या हैं इस दौरान पालन किए जाने वाले नियम?

सावन के अंत और भादो संक्रांति के आसपास आने वाले इन पांच दिनों में पूरे गांव का माहौल बेहद शांत हो जाता है। इस दौरान कई कड़े सामाजिक नियमों का पालन किया जाता है:

विशेष पहनावा: इस अवधि में महिलाएं आम पोशाक नहीं पहनतीं। पहले के समय में जहां बेहद सादगीपूर्ण जीवन शैली थी, वहीं अब महिलाएं ऊन से बने विशेष पारंपरिक वस्त्र (जिसे स्थानीय भाषा में ‘पट्टू’ कहते हैं) को लपेटकर समय बिताती हैं।

संयम और सादगी: इन पांच दिनों के दौरान गांव में किसी भी प्रकार का उत्सव, गाना-बजाना या हंसी-मजाक पूरी तरह वर्जित रहता है।

दूरी और अनुशासन: इस दौरान पति-पत्नी के बीच बातचीत बंद रहती है और वे एक-दूसरे से दूरी बनाकर रखते हैं। पुरुष भी किसी प्रकार के नशे या अनुचित आचरण से दूर रहते हैं।

परंपरा के पीछे क्या है स्थानीय मान्यता?

स्थानीय लोगों और बुजुर्गों के अनुसार, यह प्रथा केवल एक नियम नहीं बल्कि गांव की सुरक्षा और समृद्धि से जुड़ी एक आस्था है।

लोक कथाओं के अनुसार, सदियों पहले इस घाटी में राक्षसों का प्रभाव था, जो सुंदर वस्त्र पहनने वाली महिलाओं को नुकसान पहुंचाते थे। इसके बाद गांव के कुलदेवता ‘लाहुआ देवता’ ने राक्षसों का अंत कर गांव की रक्षा की थी।

उसी घटना की याद में और अपने देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्रामीणों ने सादगी से रहने का यह नियम बनाया। मान्यता है कि यदि कोई परिवार इस नियम का उल्लंघन करता है, तो घर में अनहोनी या अशुभ घटनाएं हो सकती हैं।

आधुनिक समय में कितना बदला यह रिवाज?

समय के साथ हर परंपरा में थोड़े बदलाव आते हैं और पीणी गांव में भी ऐसा ही देखने को मिला है।

जहां प्राचीन काल में इस नियम का पालन बहुत कठोर और सीमित संसाधनों में होता था, वहीं अब इसे अधिक व्यवस्थित रूप दे दिया गया है।

आज के दौर में महिलाएं पूरी तरह से निर्वस्त्र रहने के बजाय ऊन के बने हस्तनिर्मित ‘पट्टू’ का इस्तेमाल करती हैं, जिससे परंपरा का सम्मान भी बना रहे और मर्यादा का भी पूरा ध्यान रखा जा सके।

गांव के युवा और बुजुर्ग आज भी अपनी इस सांस्कृतिक विरासत और देव-आस्था को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं।

Gudiya Sagar

गुड़िया सागर 'दून हॉराइज़न' की मल्टीमीडिया और ट्रेंडिंग न्यूज़ प्रोड्यूसर हैं। वे करियर, वायरल खबरों और वीडियो जर्नलिज्म में विशेष विशेषज्ञता रखती हैं। डिजिटल मीडिया के बदलते ट्रेंड्स और युवाओं की पसंद को समझना गुड़िया की सबसे बड़ी ताकत है। सरकारी नौकरियों, शिक्षा और करियर से जुड़ी हर अहम जानकारी वे पूरी फैक्ट-चेकिंग के बाद ही युवाओं तक पहुंचाती हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रही भ्रामक खबरों की सच्चाई (Fact Check) सामने लाने और वीडियो फॉर्मेट में निष्पक्ष खबरें पेश करने के लिए गुड़िया को पत्रकारिता जगत में विशेष रूप से जाना जाता है।

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