नई दिल्ली, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय अक्सर लोग केवल पिछले रिटर्न और फंड मैनेजर के नाम पर भरोसा करते हैं, लेकिन एक्सपेंस रेशियो की एक छोटी सी अनदेखी आपके रिटायरमेंट फंड में लाखों की सेंध लगा सकती है.
भारतीय म्यूचुअल फंड बाजार में इस समय ‘डायरेक्ट’ और ‘रेगुलर’ प्लान के बीच की जंग तेज है, जहां महज 1 प्रतिशत का अंतर 20 साल की अवधि में आपके मुनाफे को 10 से 15 लाख रुपये तक कम कर सकता है. निवेश की दुनिया में इसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है, जो आपकी जानकारी के बिना आपके पोर्टफोलियो की ग्रोथ को धीमा कर देता है.
कमीशन का खेल
रेगुलर प्लान के महंगे होने का सबसे बड़ा कारण इसमें शामिल डिस्ट्रीब्यूटर का कमीशन है. एम्फी (AMFI) रजिस्टर्ड एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह कमीशन आमतौर पर 0.5 प्रतिशत से लेकर 1.5 प्रतिशत सालाना तक होता है. उदाहरण के तौर पर, निप्पॉन इंडिया फार्मा फंड के रेगुलर प्लान का एक्सपेंस रेशियो 1.82 प्रतिशत है, जबकि इसके डायरेक्ट प्लान का खर्च मात्र 0.93 प्रतिशत है.
यह कमीशन आपकी जेब से अलग से नहीं कटता, बल्कि फंड की नेट एसेट वैल्यू (NAV) से ही घटा लिया जाता है. इसका मतलब है कि जो पैसा कमीशन में चला गया, उस पर आपको अगले 20 सालों तक कंपाउंडिंग का कोई लाभ नहीं मिलता, जिससे निवेशित रकम का एक बड़ा हिस्सा ‘अदृश्य रिसाव’ की तरह बह जाता है.
लाखों के नुकसान का सटीक गणित
वैल्यू रिसर्च के डेटा के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 20 सालों में 82 इक्विटी फंड्स में से 48 ने 12 प्रतिशत से अधिक का सालाना रिटर्न दिया है. यदि आप 10 लाख रुपये का एकमुश्त निवेश करते हैं और 12 प्रतिशत रिटर्न की उम्मीद करते हैं, तो डायरेक्ट प्लान में 20 साल बाद आपकी रकम ₹96.46 लाख होगी.
वहीं, रेगुलर प्लान में 1 प्रतिशत ज्यादा लागत के कारण आपको केवल 11 प्रतिशत का प्रभावी रिटर्न मिलेगा, जिससे आपकी मैच्योरिटी वैल्यू घटकर ₹80.62 लाख रह जाएगी. यह सीधा-सीधा 16 लाख रुपये का नुकसान है. इसी तरह 10,000 रुपये की मासिक SIP पर भी यह अंतर 12 लाख रुपये से अधिक बैठता है.
कब भारी पड़ता है डायरेक्ट प्लान?
हालांकि आंकड़े डायरेक्ट प्लान के पक्ष में दिखते हैं, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अनुशासित निवेशकों के लिए ही सही है. बाजार में भारी गिरावट के दौरान, जब निवेशक घबराहट (Panic Selling) में अपना पैसा निकालने लगते हैं, तब एक सलाहकार या डिस्ट्रीब्यूटर उन्हें गलत फैसले लेने से रोकता है.
सेबी (SEBI) के हालिया ट्रेंड्स बताते हैं कि डायरेक्ट प्लान चुनने वाले कई रिटेल निवेशक अक्सर गलत समय पर एंट्री और एग्जिट करते हैं, जिससे उनका वास्तविक रिटर्न इंडेक्स से भी कम रह जाता है. ऐसे में 0.5% की अतिरिक्त फीस एक ‘बीमा प्रीमियम’ की तरह काम करती है जो आपको बड़े पोर्टफोलियो नुकसान से बचा सकती है.
म्यूचुअल फंड लागत तुलना (उदाहरण)
| फंड का प्रकार | अनुमानित एक्सपेंस रेशियो | 20 साल बाद ₹10 लाख की वैल्यू |
| डायरेक्ट प्लान (12% रिटर्न) | 0.75% – 1.00% | ₹96.46 लाख |
| रेगुलर प्लान (11% रिटर्न) | 1.75% – 2.25% | ₹80.62 लाख |
| संभावित अंतर/नुकसान | ~1.00% | ₹15.84 लाख |
कैसे करें सही चुनाव?
निवेश का फैसला लेने से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें. यदि आपके पास फंड चुनने, पोर्टफोलियो को रिबैलेंस करने और मार्केट रिसर्च के लिए समय और ज्ञान है, तो डायरेक्ट प्लान आपकी पहली पसंद होनी चाहिए. लेकिन यदि आप मार्केट के उतार-चढ़ाव देखकर विचलित हो जाते हैं, तो रेगुलर प्लान के जरिए प्रोफेशनल सलाह लेना आपके वित्तीय भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित कदम साबित हो सकता है.












