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Hartalika Teej Vrat Katha : अखंड सौभाग्य का वरदान देती है हरतालिका तीज, जानिए प्रदोष काल पूजा और पौराणिक कथा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को रखा जाने वाला हरतालिका तीज व्रत अखंड सौभाग्य और मनचाहे जीवनसाथी की कामना से जुड़ा है। इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर विधिवत पूजन और व्रत कथा सुनने की परंपरा है।

Published On: September 13, 2026 8:45 PM
Hartalika Teej Vrat Katha

Hartalika Teej Vrat Katha : भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि अखंड सौभाग्य की कामना करने वाली सुहागिनों के साथ-साथ सुयोग्य वर चाहने वाली कन्याओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

उदया तिथि की गणना के आधार पर इस बार हरतालिका तीज (Hartalika Teej) का निर्जला अनुष्ठान 14 सितंबर को पूरे विधि-विधान से संपन्न किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन दिन हस्त नक्षत्र और प्रदोष काल का मेल साधना को कई गुना अधिक फलदायी बना देता है।

हरतालिका तीज का व्रत जितना कठोर है, इसके पीछे का पौराणिक प्रसंग उतना ही प्रेरणादायी है। धार्मिक परंपरा में इस कथा को सुने या पढ़े बिना उपवास अधूरा माना जाता है।

कैलाश शिखर पर मां पार्वती का सवाल और महादेव का रहस्योद्घाटन

कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर अपने परम निष्ठावान गणों—वीरभद्र, भृंगी, शृंगी और नंदी—के साथ समाधिस्थ भाव में विराजमान थे। उसी समय मां पार्वती ने संकोच त्यागकर महादेव से एक अत्यंत गूढ़ प्रश्न पूछ लिया।

उन्होंने कहा, “हे त्रिलोकीनाथ! आप तो अंतर्यामी हैं और सबके हृदय की बात जानते हैं। कृपया मुझे बताइए कि मैंने पूर्वजन्म में ऐसा कौन सा विशिष्ट तप अथवा पुण्य संचित किया था, जिसके प्रभाव से मुझे आपके अर्धांगिनी स्वरूप में स्थान प्राप्त हुआ?”

भगवान आशुतोष ने मुस्कुराते हुए देवी को उनके पूर्वजन्म का स्मरण कराया। शिवजी ने बताया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का संयोग ब्रह्मांड के श्रेष्ठतम तत्वों के समान दुर्लभ है—जैसे नवग्रहों में सूर्य, नदियों में पावन गंगा, वेदों में सामवेद और इंद्रियों में मन का स्थान है, ठीक वैसा ही महत्व इस पावन तिथि का है।

हिमालय की कंदराओं में भीषण तपस्या और राजा हिमाचल की चिंता

सदाशिव ने कथा आगे बढ़ाते हुए बताया कि पूर्वजन्म में पार्वती पर्वतराज हिमाचल की पुत्री उमा के रूप में अवतरित हुई थीं। बाल्यावस्था से ही उनके मन में केवल शिव को पति रूप में पाने की अटूट निष्ठा थी।

किशोरावस्था में प्रवेश करते ही उन्होंने राजमहल के ऐशो-आराम त्याग दिए। ग्रीष्म ऋतु की प्रचंड धूप में तपती चट्टानों पर, मूसलाधार बारिश के थपेड़ों के बीच और शीतकाल की जमा देने वाली बर्फबारी में उन्होंने अविचल साधना की।

अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर वर्षों तक केवल सूखे पत्ते चबाकर उन्होंने काया को तपाया। कन्या की ऐसी दुर्दशा देखकर राजा हिमाचल गहरे शोक में डूब गए। वे किसी भी तरह उमा का शीघ्र विवाह कर उन्हें गृहस्थी में देखना चाहते थे।

नारद मुनि का आगमन और ‘हरतालिका’ नाम का वास्तविक रहस्य

उसी दौरान देवर्षि नारद पर्वतराज के दरबार में पहुंचे। नारद जी ने कहा कि वे बैकुंठपति भगवान श्रीहरि विष्णु की ओर से राजकुमारी उमा के लिए विवाह का प्रस्ताव लेकर आए हैं। राजा हिमाचल ने इसे अपना परम सौभाग्य माना और बिना पार्वती की सम्मति लिए विवाह का वचन दे दिया।

जब यह समाचार उमा तक पहुंचा, तो वे विलाप करने लगीं। उनके हृदय में तो केवल महादेव बसे थे। तब उनकी एक घनिष्ठ सखी ने साहस दिखाया। उसने उमा से कहा कि वह उन्हें एक ऐसे बीहड़ और गुप्त वन की गुफा में छिपा देगी, जहां महाराज हिमाचल की सेना भी न पहुंच सके।

संस्कृत में ‘हरत’ का अर्थ है हरण करना और ‘आलिका’ का अर्थ है सखी। चूंकि सखी ने पार्वती का हरण कर उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया, इसलिए इस व्रत का नाम हमेशा के लिए ‘हरतालिका’ पड़ गया।

बालू के शिवलिंग की आराधना और महादेव का साक्षात वरदान

राजा हिमाचल पुत्री के लापता होने पर वियोग में मूर्छित हो गए, उधर बीहड़ कंदरा में देवी पार्वती ने नदी तट की पवित्र बालू (रेत) से शिवलिंग का निर्माण किया। भाद्रपद तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र के दौरान उन्होंने वन के फूलों, बेलपत्र और पत्तियों से भगवान शिव का षोडशोपचार पूजन किया और पूरी रात जागरण करते हुए निर्जला व्रत रखा।

इस अगाध निष्ठा और कठोर तप के कंपन से कैलाश पर भगवान शिव का आसन डोल उठा। आशुतोष प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उन्होंने देवी को मनचाहा वर मांगने को कहा।

पार्वती ने हाथ जोड़कर केवल एक ही वरदान मांगा—”हे देवाधिदेव, आप मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें।” महादेव ने ‘तथास्तु’ कहकर यह स्वीकार किया। इसके बाद राजा हिमाचल भी ढूंढते हुए वहां पहुंचे और सत्य जानकर उन्होंने पूरे विधि-विधान से शिव-पार्वती का विवाह संपन्न कराया।

पारंपरिक मान्यता है कि जो भी महिला इस दिन पूरी श्रद्धा से मिट्टी या बालू के शिवलिंग की प्रदोष काल में पूजा करती है, उसे जीवन में वैवाहिक सुख और दीर्घायु का वरदान मिलता है।

Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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