Hartalika Teej Vrat Niyam : भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का पर्व पूरे भक्ति भाव से मनाया जाता है। सुहागिन महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र और घर-परिवार में सुख-शांति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
वहीं, कुंवारी लड़कियां भी मनपसंद जीवनसाथी की कामना के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती हैं। यह पर्व केवल एक दिन के उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माता पार्वती के प्रेम, धैर्य और अटूट संकल्प का प्रतीक है।
आइए जानते हैं कि इस व्रत की शुरुआत कैसे हुई, इसका नाम ‘हरतालिका’ क्यों पड़ा और पूजा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
नाम के पीछे जुड़ी है सखियों की चतुराई
‘हरतालिका’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—’हरत’ यानी हरण करना और ‘आलिका’ यानी सखी या सहेली।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से तय करना चाहते थे। लेकिन पार्वती जी मन ही मन भगवान शिव को अपना पति स्वीकार कर चुकी थीं। जब उनकी सखियों को इस बात का पता चला, तो वे पार्वती जी को पिता के महल से दूर एक घने जंगल में ले गईं।
वहां छिपकर माता पार्वती ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बालू का शिवलिंग बनाकर कठिन साधना शुरू की। सखियों द्वारा हरण कर वन में ले जाने की इसी घटना के कारण इस पर्व को हरतालिका कहा गया।
अखंड तप और भोलेनाथ का वरदान
जंगल में रहते हुए माता पार्वती ने बिना अन्न-जल ग्रहण किए वर्षों तक कठोर तपस्या की। ठंड, गर्मी और बारिश की परवाह किए बिना उनका ध्यान केवल शिवजी में रमा रहा।

माता के इस निस्वार्थ प्रेम और दृढ़ संकल्प को देखकर अंततः भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने पार्वती जी को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया।
तभी से यह विश्वास चला आ रहा है कि जो भी महिला या कन्या पूरे मन से इस दिन शिव-पार्वती की उपासना करती है, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।
पूजा की तैयारी और सुहाग सामग्री
हरतालिका तीज पर घर में मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाकर पूजा करने की परंपरा है।
पूजा के लिए यह सामग्री प्रमुख रूप से उपयोग में आती है:
- शिवजी के लिए: बेलपत्र, धतूरा, मदार के फूल, भांग, अक्षत, कच्चा दूध और चंदन।
- माता पार्वती के लिए सुहाग पिटारी: हरी चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, आलता, काजल, चुनरी और बिछिया।
- भोग और अर्पण: ताजे फल, मिठाई, दीपक और नैवेद्य।
शाम के समय स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर चौकी पर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। विधि-विधान से पूजन के बाद हरतालिका तीज की व्रत कथा सुनना अनिवार्य माना जाता है। कई घरों और मुहल्लों में महिलाएं मिलकर पूरी रात जागरण और भजन-कीर्तन भी करती हैं।

सोलह श्रृंगार और उत्सव का रंग
तीज के दिन महिलाओं के सजने-संवरने का विशेष महत्व है। हाथों में रची मेहंदी और पारंपरिक परिधान वैवाहिक जीवन के उल्लास को दर्शाते हैं।
माता पार्वती को चढ़ाई गई सुहाग सामग्री में से सिंदूर और चूड़ियां महिलाएं प्रसाद स्वरूप स्वयं धारण करती हैं। गांव और शहरों में महिलाएं एक जगह एकत्र होकर पूजा करती हैं, जिससे आपसी मेलजोल और लोक परंपराएं जीवंत बनी रहती हैं।
स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी है जरूरी
धार्मिक परंपरा में यह व्रत 24 घंटे तक बिना पानी के (निर्जला) रखने का नियम है। हालांकि, भक्ति के साथ अपनी सेहत का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
यदि कोई महिला गर्भवती है, स्तनपान करा रही है, या फिर डायबिटीज व बीपी जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तो उसे पूरी तरह भूखे-प्यासे रहने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में फलाहार लेकर या पानी पीकर भी पूजा की जा सकती है।

अपने शरीर की क्षमता को समझें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेकर ही उपवास का नियम तय करें।















