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Mangla Gauri Vrat Katha : मां मंगला गौरी की कृपा से टल जाते हैं जीवन के संकट, जानें नवविवाहितों के नियम और पूरी कथा

सावन का तीसरा मंगला गौरी व्रत वैवाहिक सुख, सौभाग्य और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस व्रत की संपूर्ण पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, नवविवाहिताओं से जुड़े नियम और पौराणिक व्रत कथा यहां पढ़ें।

Published On: August 18, 2026 9:46 AM
Mangla Gauri Vrat Katha

Mangla Gauri Vrat Katha : सावन के महीने में जहां सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित होता है, वहीं हर मंगलवार मां पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है।

यह व्रत वैवाहिक जीवन में मधुरता, पति की लंबी आयु और संतान सुख की कामना के लिए रखा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से मां मंगला गौरी की उपासना करने से दांपत्य जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

पूजा के लिए दिनभर के शुभ मुहूर्त

पूजा की तैयारी के लिए समय का ध्यान रखना अच्छा माना जाता है। दिन के प्रमुख शुभ समय इस प्रकार हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:25 से 05:08 बजे तक
  • शुभ चौघड़िया (चर-लाभ-अमृत): सुबह 09:08 से दोपहर 02:03 बजे तक
  • अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:59 से 12:51 बजे तक
  • गोधूलि (शाम का समय): शाम 06:58 से 07:20 बजे तक
  • अमृत काल (रात्रि): रात 09:19 से 11:02 बजे तक

नवविवाहित महिलाओं के लिए जरूरी नियम

जिन महिलाओं का विवाह हाल ही में हुआ है और यह उनका पहला सावन है, उनके लिए परंपरा में कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:

मायके में पहला व्रत: मान्यता के अनुसार, विवाह के बाद पहले सावन का मंगला गौरी व्रत मायके में रहकर करना शुभ माना जाता है।

5 साल का संकल्प: यह व्रत विवाह के शुरुआती 5 वर्षों तक लगातार रखने की परंपरा है। पहले साल के बाद बाकी के 4 साल का व्रत ससुराल में पूरा किया जाता है।

मंगला गौरी पूजा की सरल विधि

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें।

घर के मंदिर में मां पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। देवी को लाल पुष्प, रोली, चंदन और 16 प्रकार की सुहाग सामग्री अर्पित करें।

इसके साथ ही शिवलिंग पर गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें। शिवजी को बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद चंदन और अक्षत चढ़ाएं।

दिन में व्रत कथा का पाठ करें या सुनें। शाम को प्रदोष काल में धूप-दीप जलाकर शिव परिवार की आरती करें और पूजा में अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा मांगें।

मंगला गौरी व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन समय में धर्मपाल नाम का एक दयालु और धनी सेठ अपनी पत्नी के साथ रहता था। जीवन में सब कुछ होने के बाद भी संतान न होने से दोनों अक्सर उदास रहते थे। एक दिन उनके द्वार पर आए एक पहुंचे हुए साधु ने बताया कि उनके भाग्य में संतान सुख नहीं लिखा है।

निराश दंपती ने उपाय पूछा, तो साधु ने उन्हें सावन में मां मंगला गौरी का विधिपूर्वक व्रत करने की सलाह दी। सेठ और सेठानी ने पूरे नियम और निष्ठा से हर मंगलवार व्रत रखना शुरू किया।

वे गरीबों को भोजन कराते और माता पार्वती की सच्चे भाव से सेवा करते। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने स्वप्न में दर्शन दिए और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। समय आने पर उनके घर एक सुंदर बालक का जन्म हुआ।

जब पुत्र बड़ा हुआ, तो उसका विवाह एक सुशील कन्या से हुआ। विवाह के बाद पता चला कि युवक की आयु कम है।

यह सुनकर उसकी पत्नी घबराने के बजाय पूरी आस्था के साथ मंगला गौरी का व्रत रखने लगी और हर मंगलवार पति की रक्षा की प्रार्थना करती रही।

मां गौरी की कृपा से युवक पर आने वाला भारी संकट टल गया और उसे दीर्घायु प्राप्त हुई। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि जो भी महिला यह व्रत निष्ठापूर्वक करती है, उसके सुहाग की रक्षा होती है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।

Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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