RBI Repo Rate : भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक 3 अगस्त से शुरू होकर 5 अगस्त तक चलेगी। 5 अगस्त की सुबह केंद्रीय बैंक रेपो रेट को लेकर अपनी नई नीति का ऐलान करेगा। कर्जदारों और बैंकिंग सेक्टर की नजरें इस फैसले पर टिकी हुई हैं।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रिजर्व बैंक इस बार ब्याज दरों को यथावत रख सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के बढ़ते दाम और मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए केंद्रीय बैंक जल्दबाजी में कोई कदम उठाने से बचना चाहता है।
इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियां भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रही हैं। मध्य पूर्व में तनाव के चलते कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। यदि यह स्थिति लंबी खींचती है तो भारत में आयातित महंगाई का दबाव तेजी से बढ़ेगा।

मानसून की चाल भी नीतिगत फैसलों के लिए निर्णायक बनी हुई है। देश के कुछ हिस्सों में बारिश का रुझान असमान रहा है। पर्याप्त बारिश होने की स्थिति में ही खाद्य वस्तुओं के दाम नियंत्रण में रहेंगे, अन्यथा आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं।
केंद्रीय बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हालिया बयानों में स्पष्ट किया है कि संस्था का मुख्य ध्यान महंगाई को नियंत्रित करने पर है। गवर्नर ने संकेत दिए हैं कि जब तक रिटेल महंगाई दर तय दायरे में नहीं आ जाती, तब तक आक्रामक नरमी बरतना जोखिम भरा हो सकता है।
रिजर्व बैंक ने पिछले साल से अब तक नीतिगत ब्याज दरों में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की है। इस कटौती का उद्देश्य बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाना और आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देना था। बैंक प्रबंधन अब देखना चाहता है कि इन पुरानी कटौतियों का जमीनी स्तर पर कितना असर हुआ है।
यदि वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान महंगाई दर अनुमान से अधिक बनी रहती है, तो रिजर्व बैंक आगे चलकर ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रुख भी अपना सकता है। बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर परिस्थितियां बिगड़ीं तो इस चालू वित्त वर्ष में दो बार दरों में बढ़ोतरी संभव है।
5 अगस्त को आने वाले बयान में चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी विकास दर और रिटेल महंगाई के अनुमानों में भी संशोधन किया जा सकता है। घरेलू मांग मजबूत रहने से जहां विकास दर के आंकड़े को सहारा मिल रहा है, वहीं वैश्विक सुस्ती और महंगे ईंधन आयात के कारण विकास दर की रफ्तार सीमित रहने की आशंका भी जताई जा रही है।
बैंकिंग प्रणाली में नकदी के प्रबंधन को लेकर भी इस बैठक में किसी बड़े नए ऐलान की संभावना कम है। रिजर्व बैंक जरूरत पड़ने पर रेपो ऑक्शन और ओपन मार्केट ऑपरेशन्स के जरिए बाजार में तरलता का संतुलन बनाए रखेगा।













