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Budget 2026: शेयर बाजार निवेशकों की सबसे बड़ी मांग, क्या घटेगा LTCG टैक्स?

केंद्रीय बजट 2026 से पहले शेयर बाजार निवेशकों की नजरें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स पर टिकी हैं. वर्तमान में एक साल से ज्यादा समय तक रखे गए शेयरों पर 1.25 लाख रुपये से अधिक मुनाफे पर 12.5% टैक्स लगता है. निवेशक इसे महंगाई और कंपाउंडिंग के मुनाफे पर चोट मानते हुए सरकार से नियमों में ढील की उम्मीद कर रहे हैं.

Published on: January 26, 2026 10:05 AM
Budget 2026: शेयर बाजार निवेशकों की सबसे बड़ी मांग, क्या घटेगा LTCG टैक्स?
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HIGHLIGHTS

  1. लिस्टेड शेयर या इक्विटी फंड को 12 महीने बाद बेचने पर लगता है लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स.
  2. एक वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के मुनाफे पर 12.5% की दर से टैक्स देनदारी.
  3. महंगाई दर (Inflation) का लाभ न मिलने से निवेशकों को होती है वास्तविक मुनाफे में कमी.
  4. Budget 2026 में टैक्स लिमिट बढ़ने या नियमों में सरलीकरण की आस.

Budget 2026 : केंद्रीय बजट की आहट के साथ ही शेयर बाजार के करोड़ों निवेशकों की धड़कनें तेज हो गई हैं. बजट सिर्फ सरकारी खाते का हिसाब नहीं, बल्कि आम निवेशक की जेब का फैसला भी करता है.

इस बार निवेशकों के रडार पर सबसे बड़ा मुद्दा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) टैक्स है. बजट 2026 से उम्मीद की जा रही है कि लंबी अवधि के निवेश पर लगने वाले इस टैक्स में सरकार कुछ राहत दे सकती है.

क्या है LTCG और यह कब लगता है?

साधारण शब्दों में, जब आप अपनी मेहनत की कमाई को लंबे समय तक निवेश करके रखते हैं और उस पर मुनाफा कमाते हैं, तो सरकार उस मुनाफे पर हिस्सा मांगती है. भारतीय नियमों के अनुसार, अगर कोई निवेशक लिस्टेड शेयर या इक्विटी म्यूचुअल फंड को खरीदने के कम से कम 12 महीने (एक साल) बाद बेचता है, तो उसे ‘लॉन्ग टर्म’ माना जाता है.

फिलहाल नियम यह है कि एक वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये तक का मुनाफा टैक्स फ्री है. लेकिन जैसे ही मुनाफा इस सीमा को पार करता है, उस पर 12.5% की दर से टैक्स चुकाना पड़ता है. वहीं, एक साल से कम समय में शेयर बेचने पर अलग दरें लागू होती हैं.

कंपाउंडिंग और भविष्य की प्लानिंग पर चोट

निवेशकों को यह टैक्स सबसे ज्यादा इसलिए अखरता है क्योंकि यह लंबी अवधि के निवेश के मूल सिद्धांत ‘कंपाउंडिंग’ (ब्याज पर ब्याज) को कमजोर करता है. लोग रिटायरमेंट, बच्चों की उच्च शिक्षा या बुढ़ापे की सुरक्षा के लिए पैसा जोड़ते हैं. जब बरसों बाद मैच्योरिटी या रिडेम्पशन का समय आता है, तो टैक्स का एक बड़ा हिस्सा मुनाफे से निकल जाता है, जिससे हाथ में आने वाली रकम उम्मीद से कम हो जाती है.

महंगाई और दोहरी मार का दर्द

इस टैक्स प्रणाली में सबसे बड़ी खामी यह मानी जाती है कि इसमें महंगाई (Inflation) को एडजस्ट नहीं किया जाता. यानी अगर 10 साल में महंगाई की वजह से पैसे की वैल्यू कम हुई है और शेयर का भाव बढ़ा है, तो भी आपको पूरे बढ़े हुए भाव पर टैक्स देना होगा.

इसके अलावा, कंपनियां पहले ही कॉरपोरेट टैक्स चुकाती हैं और डिविडेंड पर भी टैक्स लगता है. ऐसे में निवेशकों को लगता है कि एक ही कमाई पर बार-बार टैक्स (Double Taxation) वसूला जा रहा है.

बाजार के व्यवहार पर असर

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि कड़े टैक्स नियमों के कारण निवेशक अपना पोर्टफोलियो बैलेंस करने से कतराते हैं. उन्हें डर रहता है कि अच्छा शेयर बेचने पर टैक्स कट जाएगा. इससे बाजार में लिक्विडिटी प्रभावित होती है और निवेशक सही समय पर मुनाफा वसूली नहीं कर पाते.

अब देखना यह है कि वित्त मंत्री इस बजट में निवेशकों की इस मांग को सुनती हैं या यह मुद्दा एक बार फिर अगले साल के लिए टल जाता है.

Rajat Sharma

रजत शर्मा बतौर ऑथर करीब 3 साल से दून हॉराइज़न से जुड़े हुए हैं। मूल रूप से देहरादून (उत्तराखंड) के रहने वाले रजत शर्मा दून हॉराइज़न में बिजनेस सेक्शन के लिए खबरें लिखते हैं। उन्हें बिजनेस सेक्शन के अलग-अलग जॉनर की खबरों की समझ है। इसमें स्टॉक मार्केट, पर्सनल फाइनेंस, यूटिलिटी आदि शामिल हैं। करीब 7 साल से मीडिया इंडस्ट्री में सक्रिय रजत ने यहां से पहले कई और मीडिया संस्थानों में बतौर कंटेंट राइटर काम किया है। उन्हें रिपोर्टिंग का भी अनुभव है। 📧 Email: info.dhnn@gmail.com

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