Ganpati Morya History : गणेश चतुर्थी का पर्व आते ही चारों तरफ एक ही गूंज सुनाई देती है—’गणपति बप्पा मोरया’। हम सब बचपन से इस जयकारे को पूरे उत्साह के साथ लगाते आ रहे हैं।
‘गणपति’ यानी गणों के स्वामी और ‘बप्पा’ यानी पिता तुल्य संरक्षक, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि इस उद्घोष में ‘मोरया’ शब्द क्यों जोड़ा जाता है?
महाराष्ट्र की गणेश भक्ति परंपरा के अनुसार, यह शब्द भगवान गणेश के एक परम भक्त मोरया गोसावी के नाम से आया है। यह कहानी बताती है कि जब कोई भक्त पूरी निष्ठा से ईश्वर की सेवा करता है, तो भगवान उसका नाम अपने नाम के साथ हमेशा के लिए जोड़ लेते हैं।
कौन थे मोरया गोसावी?
इतिहास और मान्यताओं के अनुसार, मोरया गोसावी 14वीं शताब्दी के एक सिद्ध संत थे। उनका अधिकांश जीवन महाराष्ट्र के पुणे के पास स्थित चिंचवड़ में बीता।
वे अष्टविनायक में शामिल मोरगांव के मयूरेश्वर गणपति के अनन्य उपासक थे। मोरया गोसावी का नियम था कि वे हर गणेश चतुर्थी पर चिंचवड़ से पैदल चलकर मोरगांव जाते थे और वहां भगवान गणेश की विशेष पूजा-अर्चना करते थे।
उस दौर में यह यात्रा बेहद कठिन थी, लेकिन उनकी भक्ति कभी कम नहीं हुई।
जब बढ़ती उम्र बनी चुनौती
वर्षों तक यह क्रम बिना रुके चलता रहा। जैसे-जैसे मोरया गोसावी की उम्र बढ़ी, उनके लिए मोरगांव की लंबी और दुर्गम पैदल यात्रा करना शारीरिक रूप से मुश्किल होने लगा।
कहा जाता है कि अपने भक्त की इस व्यथा को देखकर गणपति बप्पा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने मोरया गोसावी को स्वप्न में संकेत दिया कि अब उन्हें इतनी दूर आने की आवश्यकता नहीं है, वे स्वयं उनके पास आ रहे हैं।
पवना नदी से मिली गणेश प्रतिमा
मान्यता के अनुसार, अगले दिन जब मोरया गोसावी चिंचवड़ की पवना नदी में स्नान कर रहे थे, तब उनके हाथों में जल के भीतर से भगवान गणेश की एक स्वयंभू प्रतिमा आ गई।

मोरया गोसावी ने उस दिव्य प्रतिमा को नदी तट पर स्थापित किया और वहीं नियमित रूप से सेवा करने लगे। इसके बाद चिंचवड़ ही गणेश भक्तों के लिए एक बड़ा तीर्थ स्थल बन गया। दूर-दूर से लोग संत मोरया गोसावी के दर्शन करने और उनकी साधना देखने आने लगे।
कैसे बना ‘मंगलमूर्ति मोरया’ और फिर ‘बप्पा मोरया’
जब लोग चिंचवड़ आते, तो वे संत के प्रति आदर प्रकट करते हुए ‘मोरया’ कहते और भगवान के मंगलकारी स्वरूप के लिए ‘मंगलमूर्ति’ का उच्चारण करते। धीरे-धीरे दोनों नाम आपस में घुल-मिल गए और परंपरा में ‘मंगलमूर्ति मोरया’ का उद्घोष शुरू हुआ।
समय के साथ जब गणेशोत्सव सार्वजनिक रूप से मनाया जाने लगा, तो लोकभाषा में यह जयकारा और अधिक सरल होकर ‘गणपति बप्पा मोरया’ बन गया।
यह जयकारा हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की नजर में भक्त और भगवान का रिश्ता बराबरी और अटूट प्रेम का होता है। यही कारण है कि आज भी हर विसर्जन और हर पूजा में मोरया गोसावी की भक्ति की गूंज सुनाई देती है।











