नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम मुद्दे पर चिंता जताई है। कोर्ट का कहना है कि यौन अपराधों से जुड़े केसों में जजों द्वारा की जाने वाली असंवेदनशील या गलत टिप्पणियां न सिर्फ पीड़िता को बल्कि उसके परिवार और पूरे समाज को गहरा आघात पहुंचाती हैं। सोमवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने साफ संकेत दे दिए कि ऐसी टिप्पणियों को रोकने के लिए पूरे देश की अदालतों के लिए नए और सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।
आखिर माजरा क्या है?
दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक पुराने फैसले का। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़, उसके कपड़े उतारने की कोशिश, पायजामा का नाड़ा खोलना या उसे जबरन पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश को बलात्कार या बलात्कार की कोशिश की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट को यह बात बेहद गलत लगी और उसने इस पर सवाल उठाए।
देश भर में हो रही हैं ऐसी टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान कई वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट को बताया कि पिछले कुछ सालों में अलग-अलग हाईकोर्ट्स में यौन अपराधों के मामलों में जजों ने कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं। मिसाल के तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा था कि रात का समय आरोपी के लिए जैसे खुला न्योता था। इसी तरह कलकत्ता और राजस्थान हाईकोर्ट के भी कुछ फैसले सामने आए जिनमें पीड़िता को ही गलत ठहराने वाली भाषा इस्तेमाल हुई। एक जिला अदालत के मामले में तो पीड़िता को सुनवाई के दौरान ही परेशान करने की शिकायत मिली।
पीड़िता पर क्या असर पड़ता है?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी टिप्पणियां सिर्फ कागजों पर नहीं रहतीं, बल्कि पीड़िता के मन में डर पैदा करती हैं। कई बार तो ये टिप्पणियां पीड़िता पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बनाने का तरीका बन जाती हैं। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने माना कि ये टिप्पणियां समाज में गलत संदेश भी जाती हैं और अपराधियों को हौसला देती हैं।
अब क्या होगा आगे?
कोर्ट ने सभी वकीलों से कहा है कि अगली सुनवाई तक वे ऐसे सभी मामलों के उदाहरण और अपने सुझाव लिखित में जमा करें। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट पूरे देश के हाईकोर्ट और जिला अदालतों के लिए एक व्यापक गाइडलाइन जारी कर सकता है। इसका मकसद है कि भविष्य में जजों की जुबान से ऐसी कोई बात न निकले जो पीड़िता के सम्मान को ठेस पहुंचाए।
यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि भारत में यौन अपराधों के खिलाफ कानून भले ही सख्त हो गए हों, लेकिन अदालतों में भाषा और व्यवहार अब भी कई बार पीड़ित-विरोधी हो जाता है। उम्मीद है कि नए दिशा-निर्देश आने के बाद पीड़िताओं को न्याय मिलने में और आसानी होगी।


















