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उत्तराखंड में तैयार हुआ ‘संकेत’ सिस्टम, बादल फटने और भूस्खलन से पहले मिलेगा अलर्ट

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Harpreet Singh Updated Mon, 14 Sep 2026 12:50 PM IST

उत्तराखंड में बादल फटने, लैंडस्लाइड और भारी बारिश के सटीक खतरे बताने के लिए आपदा प्रबंधन विभाग 'संकेत' (SANKET) प्लेटफॉर्म ला रहा है। जानिए कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम।

Uttarakhand disaster management SANKET

मुख्य बातें

  • 'संकेत' (SANKET) अर्ली वार्निंग सिस्टम से उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं की पहले सूचना मिलेगी।
  • मौसम के आंकड़ों के साथ सड़क, बिजली और बस्तियों पर पड़ने वाले असर का सटीक आकलन होगा।
  • राज्य और सभी जिला आपातकालीन परिचालन केंद्र (DEOC) सीधे इस नेटवर्क से जुड़ेंगे।
  • सैटेलाइट डेटा और जमीनी सेंसर के जरिए नदियों के बढ़ते जलस्तर पर नजर रखी जाएगी।

दून हॉराइज़न, देहरादून (14 सितंबर): हिमालयी राज्य में आसमानी आफत और दरकते पहाड़ों के खतरे को देखते हुए आपदा प्रबंधन विभाग ने बड़ा तकनीकी कदम उठाया है। अब तक मौसम विभाग (IMD) की चेतावनियां केवल बारिश की मात्रा तक सीमित रहती थीं। ‘संकेत’ (SANKET) नाम से तैयार हो रहा नया प्लेटफॉर्म इस कमी को दूर करेगा।

यह सिस्टम न केवल मूसलाधार बारिश की पूर्व चेतावनी देगा, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगा कि उस बारिश से कौन-सी सड़क बंद हो सकती है और किन ढलानों पर भूस्खलन का जोखिम सबसे ज्यादा है।

पहाड़ों में अचानक फटने वाले बादल और उफनती नदियां हर साल भारी तबाही मचाती हैं। ऐसे में सटीक जमीनी जानकारी का समय पर मिलना जीवन और मौत के बीच का फर्क तय करता है।

हाइड्रोमेट नेटवर्क और ‘संकेत’ का तकनीकी ढांचा

राज्य में जल और मौसम संबंधी निगरानी को आधुनिक बनाने के लिए विस्तृत हाइड्रोमेट (Hydromet Network) तैयार किया जा रहा है। इसी के तहत ‘स्मार्ट अलर्ट नेटवर्क फॉर नॉलेज, अर्ली वार्निंग एंड ट्रैकिंग’ यानी ‘संकेत’ को केंद्रीय मंच बनाया गया है। यह नेटवर्क भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, केंद्रीय जल आयोग और इसरो (ISRO) की सैटेलाइट इमेजरी के साथ-साथ राज्य भर में लगे ऑटोमैटिक वेदर स्टेशनों के डेटा को एक जगह प्रोसेस करेगा।

आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, पारंपारिक अनुमान केवल मिलीमीटर में बारिश दर्ज करते हैं। इसके विपरीत, नया ढांचा इम्पैक्ट-बेस्ड फोरकास्टिंग मॉडल पर चलेगा। इसका सीधा मतलब यह है कि सिस्टम यह गणना करेगा कि किसी खास घाटी में 70 मिमी बारिश होने पर वहां के बुनियादी ढांचे, पेयजल लाइनों और खड़ी फसलों को कितना नुकसान पहुंच सकता है।

कंट्रोल रूम से लेकर गांवों तक रियल-टाइम सूचना का प्रवाह

जोखिम का आकलन होते ही सूचनाएं सबसे पहले राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र (SEOC) और संबंधित 13 जिलों के जिला आपातकालीन परिचालन केंद्रों (DEOC) को भेजी जाएंगी। इसके बाद प्रशासन ऑटोमेटेड बल्क मैसेज, सायरन और आपदा मित्रों के जरिए संवेदनशील तोकों और गांवों तक अलर्ट पहुंचाएगा। समय रहते चेतावनी मिलने से चारधाम यात्रा रूट पर फंसे श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने में मदद मिलेगी।

प्रशासन का लक्ष्य मानसून और शीतकालीन पश्चिमी विक्षोभ के दौरान रिस्पांस टाइम को न्यूनतम करना है, जिससे संवेदनशील रिवर बेसिन में जान-माल का नुकसान रोका जा सके।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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