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क्या उम्मीदवारों पर निर्भर रहकर निष्पक्ष चुनाव करा पाएगा चुनाव आयोग? जस्टिस नागरत्ना ने उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस बीवी नागरत्ना ने निर्वाचन आयोग की संरचनात्मक स्वतंत्रता पर चिंता जताते हुए कहा है कि यदि चुनाव कराने वाले लोग उम्मीदवारों पर निर्भर होंगे, तो निष्पक्षता संभव नहीं है। उन्होंने पटना में आयोजित एक व्याख्यान के दौरान लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग जैसे संस्थानों को 'चौथे स्तंभ' की संज्ञा दी।

क्या उम्मीदवारों पर निर्भर रहकर निष्पक्ष चुनाव करा पाएगा चुनाव आयोग? जस्टिस नागरत्ना ने उठाए गंभीर सवाल

HIGHLIGHTS

  • जस्टिस नागरत्ना ने चुनाव आयोग को लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बताया।
  • संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और उनकी संरचना पर 1995 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला।
  • केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय के लिए दलीय राजनीति से ऊपर उठने की पुरजोर वकालत।

नई दिल्ली/पटना, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की भूमिका और उसकी स्वायत्तता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सीनियर जज न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने एक बेहद तीखा और तथ्यात्मक विश्लेषण पेश किया है।

जस्टिस नागरत्ना ने दोटूक शब्दों में कहा कि यदि चुनाव प्रक्रिया का संचालन करने वाली संस्था और उसके अधिकारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर ही निर्भर रहेंगे, तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।

पटना स्थित चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) में आयोजित ‘राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान’ को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने निर्वाचन आयोग की संरचनात्मक स्वतंत्रता (Structural Independence) को लेकर गहरा सवाल खड़ा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव केवल कैलेंडर की तारीखें या समय-समय पर होने वाली महज एक घटना नहीं है। यह वह अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके दम पर देश में सरकारों का गठन होता है और लोकतंत्र की सांसें चलती हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने अपने संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक ऐतिहासिक फैसले की नज़ीर पेश की। उन्होंने याद दिलाया कि उस वक्त भी कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के रूप में परिभाषित किया था। उनके अनुसार, जिस तरह राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तें तय होती हैं, चुनाव प्रक्रिया पर नियंत्रण भी बिल्कुल वैसा ही है। अगर इस नियंत्रण की डोर कमजोर हुई, तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा सकती है।

संविधान के पारंपरिक तीन स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—से इतर जस्टिस नागरत्ना ने एक नए विजन पर जोर दिया। उन्होंने चुनाव आयोग, सार्वजनिक वित्त और नियामक संस्थाओं को ‘चौथे स्तंभ’ (Fourth Pillar) जैसी संस्थाएं बताया। उन्होंने तर्क दिया कि सत्ता केवल औपचारिक इमारतों से नहीं, बल्कि इन प्रक्रियाओं से चलती है जो उन्हें बनाए रखती हैं। इन संस्थाओं की स्वायत्तता पर आंच आना सीधे तौर पर संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

इस दौरान न्यायमूर्ति ने संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों की पेचीदगियों पर भी अपना पक्ष रखा। उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की कि शासन और विकास के मुद्दों पर दलगत मतभेदों को हावी न होने दें। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश का प्रशासन इस बात की भेंट नहीं चढ़ना चाहिए कि केंद्र में किस विचारधारा की सरकार है और राज्य में कौन सत्ता संभाल रहा है।

ऐतिहासिक आंकड़ों और हालिया न्यायिक टिप्पणियों के आलोक में जस्टिस नागरत्ना का यह बयान चुनावी सुधारों की दिशा में एक बड़ी बहस छेड़ सकता है।

Shailendra Pokhriyal

शैलेन्द्र पोखरियाल 'दून हॉराइज़न' में वरिष्ठ राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर देश की सियासत और प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं। केंद्र सरकार की नीतियों, संसद के सत्रों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर उनकी गहरी पकड़ है। शैलेन्द्र का उद्देश्य राजनीतिक बयानों और सरकारी फैसलों के पीछे की असली सच्चाई को निष्पक्ष रूप से पाठकों के सामने रखना है। उनका लंबा पत्रकारीय अनुभव उन्हें जटिल राष्ट्रीय मुद्दों का आसान हिंदी में विश्लेषण करने में मदद करता है। वे पूरी तरह से शोध-आधारित (Fact-checked) और जनहित से जुड़ी बेबाक पत्रकारिता करने के लिए जाने जाते हैं।

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