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TB Treatment : टीबी का बैक्टीरिया कैसे फेफड़ों पर करता है हमला? जानिए इसके शुरुआती लक्षण और नुकसान

टीबी (Tuberculosis) एक संक्रामक बीमारी है जो माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया की वजह से होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को नुकसान पहुंचाती है। यह संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने से हवा में फैले ड्रॉपलेट्स के जरिए दूसरों तक पहुंचती है। कमजोर इम्यूनिटी होने पर यह जानलेवा हो सकती है, लेकिन सही समय पर एंटीबायोटिक्स का कोर्स पूरा करने से इसका इलाज पूरी तरह संभव है।

Published on: January 28, 2026 6:46 AM
TB Treatment
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HIGHLIGHTS

  • टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक बैक्टीरिया से फैलता है, जो सांस और फ्लूइड एक्सचेंज से दूसरे व्यक्ति में जाता है।
  • शरीर में बैक्टीरिया जाने पर इम्यून सिस्टम उसे 'ग्रेन्युलोमा' में कैद कर लेता है, जिसे डॉर्मन्ट अवस्था कहते हैं।
  • इम्यूनिटी कमजोर होते ही बैक्टीरिया सक्रिय होकर फेफड़ों की कोशिकाओं को नष्ट करने लगता है और सांस में तकलीफ पैदा करता है।
  • डॉक्टर की सलाह पर 6 महीने से 1 साल तक एंटीबायोटिक्स का कोर्स पूरा करना ही इसका एकमात्र पक्का इलाज है।

TB Treatment : माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक बैक्टीरिया से होने वाला टीबी (Tuberculosis) महज एक बीमारी नहीं, बल्कि एक गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन है।

यह संक्रामक रोग सबसे ज्यादा इंसान के फेफड़ों को निशाना बनाता है। अगर समय रहते इसकी पहचान न हो, तो यह जानलेवा साबित हो सकता है।

संक्रमण फैलने का तरीका

टीबी का बैक्टीरिया हवा के जरिए एक इंसान से दूसरे इंसान तक पहुंचता है। जब कोई टीबी मरीज खांसता या छींकता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाले छोटे-छोटे ड्रॉपलेट्स (बूंदें) हवा में मिल जाते हैं।

स्वस्थ व्यक्ति जब सांस लेता है, तो ये ड्रॉपलेट्स उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इसके अलावा, मरीज के साथ बहुत करीब रहने या फ्लूइड एक्सचेंज (Fluid exchange) से भी संक्रमण का खतरा रहता है।

यह बैक्टीरिया सीधे तौर पर संपर्क और सांसों के माध्यम से अपना दायरा बढ़ाता है।

TB kaise failta hai
TB kaise failta hai

शरीर के भीतर की जंग: डॉर्मन्ट बनाम एक्टिव

बैक्टीरिया के शरीर में प्रवेश करते ही टीबी तुरंत बीमार नहीं करता। फेफड़ों में बैक्टीरिया पहुंचते ही हमारा इम्यून सिस्टम, विशेषकर मैक्रोफेज कोशिकाएं, सक्रिय हो जाती हैं।

ये कोशिकाएं बैक्टीरिया को चारों तरफ से घेर लेती हैं और एक ‘ग्रेन्युलोमा’ बना देती हैं। इस अवस्था को ‘डॉर्मन्ट’ (निष्क्रिय) कहा जाता है। इसमें बैक्टीरिया शरीर में मौजूद तो रहता है, लेकिन कोई नुकसान नहीं पहुंचाता।

खतरा तब बढ़ता है जब किसी कारण से इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है। एचआईवी, कुपोषण या अन्य बीमारियों की वजह से जब सुरक्षा घेरा टूटता है, तो बैक्टीरिया ‘एक्टिव’ (सक्रिय) हो जाता है।

यह घेरे को तोड़कर बाहर निकलता है और तेजी से अपनी संख्या बढ़ाने लगता है। निष्क्रिय टीबी के सक्रिय होने की संभावना 5 से 10 प्रतिशत तक होती है।

लक्षण और फेफड़ों को नुकसान

एक्टिव स्टेज में बैक्टीरिया फेफड़ों की कोशिकाओं को मारना शुरू कर देता है। इससे फेफड़ों में छोटे-छोटे दाने या ‘tubercules’ बन जाते हैं। मरीज को सांस लेने में भारी तकलीफ होती है और खांसी के साथ खून आने लगता है।

इलाज में देरी होने पर यह इन्फेक्शन फेफड़ों से निकलकर शरीर के अन्य अंगों में भी फैल सकता है। यह स्थिति मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

इलाज और बचाव का रास्ता

राहत की बात यह है कि टीबी पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी है। इसके इलाज के लिए डॉक्टर की देखरेख में एंटीबायोटिक्स का एक लंबा कोर्स चलता है, जो आमतौर पर 6 महीने से 1 साल तक का होता है। मरीज को यह कोर्स बीच में नहीं छोड़ना चाहिए।

बचाव के लिए सबसे जरूरी है अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत रखना। नियमित व्यायाम, पर्याप्त पानी पीना और हरी सब्जियों का सेवन शरीर को इस बैक्टीरिया से लड़ने की ताकत देता है।

Rama Pun

रमा पुन एक प्रशिक्षित और अनुभवी लेखिका हैं, जो हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़ी खबरों में विशेषज्ञता रखती हैं। विभिन्न न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स पर 3 वर्षों से अधिक के अनुभव के साथ, रमा पाठकों के लिए सटीक और रोचक कंटेंट तैयार करती हैं। उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी खूबी जटिल स्वास्थ्य विषयों को सरल और आम बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत करना है, जिससे आम पाठक भी उसे आसानी से समझ सकें। 📧 Email: punr29638@gmail.com

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