देहरादून : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जिला प्रशासन ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया है। यहां बड़े बकायेदारों पर नकेल कसने के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत सुभारती समूह के खिलाफ अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई शुरू की गई है।
इस समूह पर 87.50 करोड़ रुपये का बकाया है, जिसकी वसूली के लिए कुर्की की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रशासन का मानना है कि इस तरह की कार्रवाई से सरकारी राजस्व की सुरक्षा मजबूत होगी और बकायेदारों को साफ संदेश मिलेगा कि देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
सुभारती समूह की पृष्ठभूमि और विवाद
सुभारती समूह उत्तराखंड में शिक्षा क्षेत्र की एक प्रमुख संस्था है, जो मेडिकल कॉलेज समेत कई शैक्षणिक संस्थान चलाती है। लेकिन यह विवाद तब शुरू हुआ जब 2017-18 के शैक्षणिक सत्र में दाखिला लेने वाले छात्रों ने संस्थान की सुविधाओं पर सवाल उठाए। छात्रों का कहना था कि कॉलेज में जरूरी बुनियादी ढांचा नहीं है, जिससे उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
इस मुद्दे पर 74 छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) की रिपोर्ट भी शामिल थी। एमसीआई ने पाया कि कॉलेज में छात्रों को ठीक से पढ़ाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर गंभीरता से विचार किया और 2019 में एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि कुल 300 छात्रों को राज्य के तीन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में ट्रांसफर किया जाए। साथ ही, इन छात्रों से केवल सरकारी कॉलेजों में लागू फीस ही ली जाए। यह फैसला 12 अप्रैल 2019 को दोबारा पुष्टि किया गया।
कोर्ट का तर्क था कि सुभारती मेडिकल कॉलेज में छात्रों को रखना अनुचित है, क्योंकि वहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। इस ट्रांसफर से राज्य सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा, क्योंकि नए छात्रों के लिए संसाधन जुटाने पड़े, जो लगभग एक नए मेडिकल कॉलेज के बराबर था।
बकाया राशि का कारण और प्रभाव
दरअसल, सुभारती समूह ने इन 300 छात्रों से छह सालों तक पूरा शुल्क वसूला, जबकि कॉलेज में कोई उचित सुविधा नहीं दी गई। छात्रों की शिक्षा अधर में लटक गई और सरकार को नुकसान हुआ। चिकित्सा शिक्षा निदेशालय ने इस पर ध्यान दिया और जिला मजिस्ट्रेट से पूरी राशि वसूलने की सिफारिश की। अब प्रशासन ने कुर्की वारंट जारी कर दिया है। आने वाले दिनों में समूह के बैंक खाते फ्रीज किए जा सकते हैं या संपत्ति जब्त हो सकती है। यह कार्रवाई मेडिकल शिक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम है, क्योंकि भारत में मेडिकल कॉलेजों को राष्ट्रीय मेडिकल आयोग (एनएमसी) की सख्त गाइडलाइंस का पालन करना पड़ता है।
प्रशासन की सख्त नीति और भविष्य की योजनाएं
देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट सविन बंसल ने स्पष्ट किया कि सरकारी धन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने सभी राजस्व अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि बकायेदारों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करें और बड़े मामलों पर प्राथमिकता से कार्रवाई करें। रोजाना की प्रगति रिपोर्ट मांगी गई है, और जरूरत पड़ने पर नोटिस, कुर्की या अन्य कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
बंसल ने कहा कि जनता के पैसे की हिफाजत में कोई समझौता नहीं होगा, चाहे बकायेदार छोटा हो या बड़ा। इस अभियान से उत्तराखंड में राजस्व वसूली की रफ्तार बढ़ेगी और अन्य संस्थाओं को सबक मिलेगा।
यह घटना हमें याद दिलाती है कि शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता कितनी महत्वपूर्ण है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाली संस्थाओं पर नजर रखना जरूरी है, ताकि मेडिकल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विश्वास बना रहे।















