Bear Attack Uttarakhand : उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों जंगली भालुओं का खतरा काफी बढ़ गया है। टिहरी गढ़वाल जिले के नरेंद्रनगर क्षेत्र में एक युवक पर अचानक दो भालुओं ने हमला कर दिया। यह घटना सुबह के समय हुई जब वह अपनी बकरियां चराने जा रहा था।
25 साल का विजेंद्र सिंह उस दिन रोज की तरह गांव से निकला था। वह चलड गांव का रहने वाला है और आगरा खाल की ओर जा रहा था। रास्ते में जंगल के पास अचानक दो भालू उसके सामने आ गए। विजेंद्र ने हिम्मत नहीं हारी और एक भालू को गर्दन पकड़कर जोर से धक्का दे दिया, जिससे वह दूर जा गिरा।
लेकिन दूसरा भालू इससे चिढ़ गया और विजेंद्र पर टूट पड़ा। भालू के पंजों से उसके गले, कंधे और पीठ पर गहरी चोटें आईं। विजेंद्र जोर-जोर से चीखने लगा। उसकी आवाज सुनकर पास के ग्रामीण और उसके साथी दौड़कर आए। शोर मचाने से भालू डरकर भाग निकले।
ग्रामीणों ने तुरंत विजेंद्र को उठाया और एंबुलेंस बुलाई। उसे नरेंद्रनगर के श्री देव सुमन राजकीय उप जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने इलाज के बाद बताया कि उसकी हालत अब खतरे से बाहर है, हालांकि चोटें काफी गंभीर हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं भालू के हमले?
उत्तराखंड में हिमालयी काला भालू आमतौर पर ऊंचाई वाले जंगलों में रहता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में जलवायु परिवर्तन के कारण इनका व्यवहार बदल रहा है। कम बर्फबारी और गर्मी बढ़ने से भालू सर्दियों में ठीक से हाइबरनेशन नहीं कर पाते। नतीजा यह कि वे भोजन की तलाश में गांवों के करीब आ जाते हैं।
आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में अब तक राज्य में भालू के 70 से ज्यादा हमले हो चुके हैं, जिनमें कई लोगों की जान गई है और सैकड़ों घायल हुए हैं। पिछले 25 सालों में भालू के हमलों से 2000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि जंगलों में प्राकृतिक भोजन कम होने और इंसानी बस्तियों का फैलाव भी इसका बड़ा कारण है।
अधिकारियों की त्वरित कार्रवाई
घटना की खबर मिलते ही तहसीलदार अयोध्या प्रसाद उनियाल, वन क्षेत्राधिकारी विवेक जोशी और प्रभागीय वन अधिकारी दिगांथ नायक मौके पर पहुंचे। उन्होंने इलाके का जायजा लिया और ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी। वन विभाग की टीम अब उस क्षेत्र में गश्त बढ़ा रही है।
जंगलों में सुरक्षा के लिए क्या करें?
ऐसी घटनाओं से बचने के लिए ग्रामीणों को अकेले जंगल न जाने, समूह में रहने और शोर मचाने वाले उपकरण साथ रखने की सलाह दी जाती है। सरकार भी मुआवजा बढ़ाने और इलाज मुफ्त करने जैसे कदम उठा रही है। लेकिन लंबे समय में जंगलों की रक्षा और जलवायु संतुलन जरूरी है ताकि इंसान और वन्यजीव शांतिपूर्वक साथ रह सकें।
यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि उत्तराखंड की खूबसूरती के साथ चुनौतियां भी हैं। विजेंद्र की बहादुरी सराहनीय है, जो अपनी जान बचाने के साथ दूसरों के लिए प्रेरणा बन गई।



















