उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्थित डीएवी महाविद्यालय, जो अपनी शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए जाना जाता है, इन दिनों एक विवादास्पद मुद्दे की वजह से सुर्खियों में है। यहां के कानून विभाग में हाजिरी से जुड़ी अनियमितताओं ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। यह कॉलेज 1892 में स्थापित हुआ था और आज हजारों छात्रों को उच्च शिक्षा प्रदान करता है, लेकिन हालिया घटनाक्रम से इसकी साख पर असर पड़ सकता है।
RTI के माध्यम से उजागर हुई सच्चाई
यह पूरा मामला एक पूर्व छात्र की पहल से सामने आया, जिन्होंने सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत दस्तावेज मांगे। आरटीआई एक महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण है, जो नागरिकों को सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों की जानकारी हासिल करने का हक देता है।
इस मामले में मिले रिकॉर्ड्स से पता चला कि विभाग की प्रमुख डॉ. पारुल दीक्षित के उपस्थिति संबंधी विवरण में स्पष्ट विरोधाभास हैं। मई महीने के रजिस्टरों में दिखाया गया है कि वह एक ही समय पर दो अलग-अलग कमरों में कक्षाएं ले रही थीं।
दोहरी उपस्थिति का रहस्य
विस्तार से देखें तो एक रजिस्टर में पब्लिक इंटरनेशनल लॉ की क्लास रूम नंबर 21 में उनकी मौजूदगी दर्ज है, जबकि ठीक उसी वक्त दूसरे रजिस्टर में थ्योरी और प्रैक्टिकल वाली क्लास रूम 20 में उन्हें दिखाया गया। ऐसी असंगतियां न केवल प्रशासनिक लापरवाही दर्शाती हैं, बल्कि संभावित धोखाधड़ी की ओर भी इशारा करती हैं।

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों में उपस्थिति रिकॉर्ड बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये छात्रों की डिग्री और शिक्षकों की जिम्मेदारियों से जुड़े होते हैं। अगर ऐसी गड़बड़ियां आम हैं, तो इससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

पूर्व छात्र की आवाज और मांग
आरटीआई दाखिल करने वाले पूर्व छात्र अक्षय ने इस खुलासे पर गहरी चिंता जताई। उनका कहना है कि यह घटना कॉलेज की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करती है और छात्रों के भविष्य को जोखिम में डाल सकती है।
अक्षय के अनुसार, ऐसी अनियमितताओं की जांच जरूरी है ताकि शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बना रहे। भारत में हर साल लाखों छात्र कॉलेजों में दाखिला लेते हैं, और ऐसे मामलों से उनकी उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। अक्षय का यह कदम दिखाता है कि कैसे एक व्यक्ति की मुहिम बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकती है।
विभाग प्रमुख का पक्ष
इस पूरे विवाद पर डॉ. पारुल दीक्षित ने अपनी सफाई दी। उन्होंने बताया कि अक्षय एक ऐसा छात्र था, जिसे कॉलेज से निकाला गया था क्योंकि उसके व्यवहार में समस्याएं थीं। डॉ. दीक्षित के मुताबिक, अक्षय ने शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार किया था और एक बार कॉलेज परिसर में ज्वलनशील पदार्थ लेकर पकड़ा गया था।
वह मानती हैं कि अक्षय अब व्यक्तिगत दुश्मनी के चलते उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। एक शिक्षक के रूप में, वह अभी भी उसके बेहतर भविष्य की कामना करती हैं। यह बयान मामले को और जटिल बनाता है, जहां एक तरफ आरोप हैं तो दूसरी तरफ निजी रंजिश का दावा।
कॉलेज प्रशासन की भूमिका
दस्तावेजों को कॉलेज के प्राचार्य ने खुद सत्यापित किया था, जो लोक सूचना अधिकारी की भूमिका निभा रहे थे। फिर भी, इस जानकारी के सार्वजनिक होने के बाद कोई आधिकारिक जांच या कार्रवाई नहीं शुरू हुई। यह स्थिति उच्च शिक्षा विभाग और राज्य सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है।
उत्तराखंड में शिक्षा क्षेत्र पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहा है, जैसे कि फंडिंग की कमी और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतें। अगर ऐसे मामलों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इससे छात्रों का मनोबल गिर सकता है और संस्थानों की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।
शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव
यह घटना सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं है। भारत में उच्च शिक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए कई सुधार हो रहे हैं, जैसे कि यूजीसी की गाइडलाइंस और डिजिटल रिकॉर्डिंग सिस्टम। लेकिन ग्राउंड लेवल पर ऐसी अनियमितताएं बताती हैं कि अभी बहुत काम बाकी है।
छात्रों और अभिभावकों को सलाह है कि वे संस्थानों की पॉलिसी चेक करें और जरूरत पड़ने पर आरटीआई का इस्तेमाल करें। इस मामले की निष्पक्ष जांच से न केवल न्याय होगा, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकेगा।













