Dehradun News : पटेलनगर में बृहस्पतिवार को फर्जी दस्तावेजों के साथ पकड़ी गई बांग्लादेशी महिला सुबेदा बेगम उर्फ प्रिया की गिरफ्तारी ने राज्य की सुरक्षा एजेंसियों को चौंका दिया है। यह मामला सिर्फ एक घुसपैठ का नहीं, बल्कि उस सिस्टम की पोल खोलने वाला है जिसके जरिए विदेशी नागरिक आसानी से भारतीय बन रहे हैं।
पुलिस जांच में अब देहरादून और रुड़की स्थित दो कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) और दस्तावेजों का सत्यापन करने वाले बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है।
बीएलओ तक पहुंची पुलिस की जांच
पटेलनगर पुलिस ने मामले में तेजी दिखाते हुए शुक्रवार को दून स्थित सीएससी सेंटर के संचालक फिरोज को तलब किया। पुलिस ने उससे घंटों पूछताछ की। फिरोज ने पुलिस को बताया कि उसने सुबेदा का फॉर्म केवल ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से भेजा था, लेकिन दस्तावेजों का असली सत्यापन क्षेत्र के बीएलओ द्वारा किया गया था।
इस बयान के बाद पुलिस की जांच की दिशा अब उन सरकारी कर्मचारियों (बीएलओ) की ओर मुड़ गई है, जिनकी ड्यूटी उस दौरान सत्यापन के लिए लगाई गई थी। पुलिस यह पता लगा रही है कि आखिर बिना जमीनी जांच के सुबेदा के दस्तावेजों पर मुहर कैसे लग गई।
पुराना पैटर्न: मामून से सुबेदा तक एक ही कहानी
पुलिस की जांच का दायरा उस सिंडिकेट पर टिक गया है जो सुनियोजित तरीके से घुसपैठियों को नई पहचान दे रहा है। सुबेदा ने पूछताछ में रुड़की के सीएससी संचालक अजीत कुमार और दून के फिरोज का नाम लिया है। यह तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसा पिछले साल नवंबर में पकड़े गए मामून हसन और बबली बेगम के मामलों में देखा गया था।
गौरतलब है कि बांग्लादेश का रहने वाला मामून हसन ‘सचिन चौहान’ बनकर नेहरू कॉलोनी में रह रहा था और एक क्लब में बाउंसर की नौकरी कर रहा था। उसने अपनी साथी रीना चौहान की मदद से आधार और पैन कार्ड बनवाए थे। इसी तरह नवंबर में पकड़ी गई बबली बेगम भी ‘भूमि शर्मा’ बनकर दून में रह रही थी। उसके पास से भी आयुष्मान कार्ड और राशन कार्ड मिले थे।
पुलिस का मानना है कि इन सभी मामलों के पीछे एक ही नेटवर्क काम कर रहा है जो सिस्टम की कमियों का फायदा उठा रहा है। फिलहाल सुबेदा के बैंक खातों और मोबाइल डेटा को खंगाला जा रहा है ताकि इस नेटवर्क की जड़ें खोदी जा सकें।



















