देहरादून की सड़कें अब पहले जैसी नहीं रहीं। जहाँ कभी सिर्फ गाड़ियाँ तेज़ भागती थीं, वहीं आज वही चौराहे राज्य की लोक संस्कृति, राज्य आंदोलन की यादें और पहाड़ी कारीगरी की खूबसूरती लिए खड़े हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विज़न को साकार करते हुए जिला प्रशासन ने शहर के प्रमुख चौराहों को पूरी तरह बदल दिया है।
कुठालगेट और साईं मंदिर तिराहा – नया रूप, नई पहचान
महज़ छह महीने के रिकॉर्ड समय में कुठालगेट और साईं मंदिर तिराहा को दोगुना चौड़ा कर दिया गया। अब यहाँ 10 मीटर चौड़ी स्लिप रोडें बनी हैं, गोल राउंडअबाउट हैं, रात में चमकती आधुनिक लाइटिंग है और सबसे खास – गढ़वाल-कुमाऊं की पारंपरिक शैली में बनी भव्य कलाकृतियाँ।
कुठालगेट पर 135 लाख और साईं मंदिर तिराहे पर 85 लाख रुपए खर्च कर ये काम पूरे किए गए। पैसा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से आया, लेकिन आइडिया, डिज़ाइन और पूरा निष्पादन देहरादून जिला प्रशासन का अपना था।
तीलू रौतेली से टीचरी माई तक – अब चौक पर दिखती हैं वीरांगनाएँ
अब जब आप कुठालगेट से गुज़रेंगे तो तीलू रौतेली की बहादुरी, राज्य आंदोलन में शहीद हुए नायकों की यादें और गढ़-कुमाऊं की पुरानी लोक कलाकृतियाँ आपका स्वागत करेंगी। ये मूर्तियाँ और दीवार चित्र सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा का आईना हैं। बाहर से आने वाला हर पर्यटक यहाँ रुक कर फोटो खिंचवाता है और पूछता है – ये कौन हैं? इस तरह शहर खुद एक खुला संग्रहालय बन गया है।
यातायात भी आसान, सुरक्षा भी बढ़ी
इन चौकों को सिर्फ सुंदर नहीं बनाया गया, बल्कि सुरक्षित और सुगम भी बनाया गया है। नई राउंडअबाउट सिस्टम से जाम कम हुआ है, दुर्घटनाएँ घटी हैं और रात में गाड़ियाँ अब बिना रुके आसानी से निकल जाती हैं। यानी सुंदरता के साथ-साथ व्यावहारिकता का भी पूरा ख्याल रखा गया।
दिलाराम चौक का नंबर अब जल्द
पहले चरण में चार बड़े चौराहों को बदला जा रहा है। कुठालगेट और साईं मंदिर तिराहा का काम पूरा हो चुका है। अब दिलाराम चौक पर पौराणिक और धार्मिक स्थलों की थीम पर भव्य काम चल रहा है, जिसका लोकार्पण बहुत जल्द होने वाला है।
शहर अब सचमुच “स्मार्ट” और “सांस्कृतिक” दोनों लग रहा
जिलाधिकारी सविन बंसल कहते हैं कि ये चौक अब सिर्फ ट्रैफिक पॉइंट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति के ब्रांड एम्बेसडर बन गए हैं। जो पर्यटक मसूरी, ऋषिकेश या चारधाम जा रहा है, वह देहरादून आते ही राज्य की झलक देख लेगा। इससे न सिर्फ शहर की खूबसूरती बढ़ी है, बल्कि लोकल कारीगरों को भी रोज़गार मिला और हमारी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का ज़रिया बना है।
देहरादून अब सचमुच एक आधुनिक शहर बन रहा है, जो अपनी जड़ों को नहीं भूलता।














