देहरादून : देहरादून का नाम लेते ही जेहन में सबसे पहले आती है वो लंबे-पतले दाने वाली, हल्की महक वाली दून बासमती चावल की खुशबू। कभी ये चावल राजधानी की शान था, देश-विदेश में इसकी डिमांड रहती थी। लेकिन पिछले कुछ दशकों में हाइब्रिड किस्मों के आगे ये पारंपरिक धान लगभग गायब सा हो गया था।
अब अच्छी खबर ये है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर जिला प्रशासन ने इसे फिर से जिंदा करने का बीड़ा उठाया और कामयाबी भी मिल रही है। सहसपुर और विकासनगर के खेतों में एक बार फिर दून बासमती लहराने लगी है।
महिलाओं ने थामा खेती का जिम्मा, बदली पूरी तस्वीर
इस पूरे अभियान की सबसे खूबसूरत कहानी है 200 से ज्यादा महिला स्वयं सहायता समूहों की मेहनत। ये महिलाएं न सिर्फ खेती कर रही हैं, बल्कि बीज संरक्षण, रोपाई, कटाई, सुखाई से लेकर पैकेजिंग तक हर काम खुद संभाल रही हैं। ग्राम उत्थान और कृषि विभाग ने इन्हें खास ट्रेनिंग दी, मौसम के बदलते मिजाज के हिसाब से खेती के नए तरीके सिखाए। नतीजा ये हुआ कि फसल की क्वालिटी पहले से कहीं बेहतर हो गई और उपज भी बढ़ी।
जिला प्रशासन ने खरीदा 65 रुपये किलो, किसानों के चेहरे खिले
सबसे बड़ी चुनौती बाजार की होती है। जिला प्रशासन ने इसे भी हल कर दिखाया। ग्राम उत्थान विभाग ने किसानों और महिला समूहों से सीधे 65 रुपये प्रति किलो के भाव से दून बासमती खरीदी। अब तक 200 कुंतल से ज्यादा चावल की खरीद हो चुकी है और किसानों के खातों में 13 लाख रुपये से अधिक की रकम पहुंच गई। ये कीमत बाजार के सामान्य बासमती से काफी ऊपर है, इसलिए किसानों को अच्छा-खासा मुनाफा हुआ। सबसे अच्छी बात ये कि कीमत खुद किसानों ने ही तय की थी, प्रशासन ने उसे मान लिया।
हिलांस और हाउस ऑफ हिमालय बना रहे नया ब्रांड
खरीदा गया चावल अब यूं ही गोदाम में नहीं पड़ा रहेगा। हिलांस और हाउस ऑफ हिमालय जैसे लोकल ब्रांड्स के साथ मिलकर इसे प्रीमियम पैकेजिंग में बाजार में उतारा जा रहा है। जल्द ही आपको दुकानों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर “दून बासमती” अलग ब्रांड नेम से मिलने लगेगी। चावल के साथ-साथ इसके बाय-प्रोडक्ट्स जैसे भूसी, टूटा चावल और खोई से भी महिलाएं अगरबत्ती, हैंडीक्राफ्ट और ऑर्गेनिक खाद जैसी चीजें बनाएंगी, जिससे रोजगार और दोगुना हो जाएगा।
पारंपरिक तरीके से खेती, फिर भी आधुनिक टच
प्रशासन ने शुरू से ही साफ था – दून बासमती को उसी पुराने परंपरागत तरीके से उगाना है, कोई केमिकल नहीं। इसलिए चुने हुए किसानों को जैविक खेती का पूरा प्रशिक्षण दिया गया। जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए नई तकनीकें सिखाई गईं। फसल तैयार होने के बाद कृषि विभाग हर किसान को सर्टिफिकेट भी देगा, ताकि ये चावल असली और शुद्ध होने का आधिकारिक प्रमाण मिल जाए। इससे बाजार में इसकी विश्वसनीयता और बढ़ेगी।
किसान बोले – हमारा गर्व लौट आया
सहसपुर की एक महिला किसान ने बताया, “पहले हम हाइब्रिड धान उगाते थे, लेकिन उसमें वो बात नहीं थी। अब दून बासमती की खुशबू जब खेतों से आने लगी तो लगा जैसे पुराना देहरादून लौट आया।” एक बुजुर्ग किसान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारे बेटे-बहू को बता रहे हैं कि यही वो चावल है जिसकी खुशबू में हमारा बचपन बीता था।”
आगे की राह और भी सुनहरी
जिला प्रशासन का प्लान अब इसे सिर्फ देहरादून तक सीमित नहीं रखना। अगले सीजन में और ज्यादा किसानों को जोड़ा जाएगा। महिला समूहों को अपना को-ऑपरेटिव बनाने की तैयारी है। लक्ष्य है कि कुछ सालों में दून बासमती फिर से देश के टॉप प्रीमियम चावलों में अपना जगह बना ले। जब ये चावल आपके थाली में आएगा तो उसकी हर खुशबू में देहरादून के किसानों और बहनों की मेहनत की कहानी छुपी होगी।















