पौड़ी : उत्तराखंड के गांवों में लोग अब डर के साए में जी रहे हैं। जंगल से सटे घरों में बच्चे स्कूल जाने से डरते हैं और महिलाएं लकड़ी या घास लेने जंगल की ओर कदम रखने से पहले दस बार सोचती हैं। पिछले कुछ दिनों में पौड़ी और चंपावत में हुए दो बड़े हमलों ने एक बार फिर सबको हिला दिया है। एक तरफ बहादुरी की मिसाल बने युवा, तो दूसरी तरफ गुस्साए ग्रामीण जो अब वन विभाग से सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
पौड़ी के देवराड़ी गांव में दिल दहला देने वाली घटना
पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल क्षेत्र के देवराड़ी गांव में मंगलवार सुबह एक महिला जंगल के पास काम कर रही थीं। अचानक गुलदार ने उन पर हमला बोल दिया। चीखें सुनकर आसपास के लोग दौड़े, लेकिन सबसे आगे थे स्थानीय युवा अंकित कंडारी। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए गुलदार से भिड़ंत की और किसी तरह महिला को उसके पंजों से छुड़ा लिया। ग्रामीणों ने तुरंत महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, लेकिन हालत गंभीर देखते हुए जिलाधिकारी के निर्देश पर एयर एंबुलेंस बुलाई गई। अभी महिला का इलाज एम्स ऋषिकेश में चल रहा है और डॉक्टर उनकी जान बचाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
चंपावत के बाराकोट में तेंदुए ने ले ली जान
इसी तरह चंपावत जिले के बाराकोट ब्लॉक में मंगलवार तड़के 45 साल के देव सिंह सुबह घर से बाहर निकले थे। अचानक तेंदुए ने उन पर झपट्टा मार दिया। मौके पर ही उनकी मौत हो गई। गांव वाले जब तक पहुंचे, बहुत देर हो चुकी थी। गुस्साए लोगों ने सड़क जाम कर दी और वन विभाग से मांग की कि इस तेंदुए को नरभक्षी घोषित कर गोली मारने की अनुमति दी जाए। यह इस इलाके में सिर्फ एक महीने में दूसरी मौत है।
पिछले पांच सालों में पौड़ी में 27 लोगों की जान गई
पौड़ी गढ़वाल वन प्रभाग के आंकड़े डराने वाले हैं। सिर्फ छह रेंजों में पिछले पांच साल में गुलदार के हमले से 27 लोगों की मौत हो चुकी है और 105 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। सबसे बुरा साल 2022 रहा जब सात लोगों ने जान गंवाई। 2021 में सबसे ज्यादा 25 लोग घायल हुए थे। इस साल अब तक पांच मौतें और 25 से ज्यादा घायल हो चुके हैं। नागदेव, पोखड़ा, थलीसैंण, धुमाकोट जैसी रेंजों में हालात सबसे खराब हैं।
वन विभाग अब ले रहा है नए कदम
लगातार हो रहे हमलों को देखते हुए वन विभाग ने अब सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। मुख्य वन संरक्षक गढ़वाल धीरज पांडेय ने बताया कि प्रभावित गांवों में स्थानीय युवाओं को स्वयंसेवक के रूप में जोड़ा जा रहा है ताकि कोई घटना होते ही तुरंत सूचना मिल सके। ड्रोन, कैमरा ट्रैप और एनाइड गश्त बढ़ा दी गई है। महिलाओं से अपील की गई है कि जंगल जाते वक्त पंचायत या वन कर्मी को जरूर बता कर जाएं। जरूरत पड़ी तो स्कूलों के समय बदल दिए जाएंगे और व बच्चों को वन कर्मी खुद छोड़ने-लाने लगेंगे।
ग्रामीणों का गुस्सा और डर दोनों बढ़ रहा है
गांवों में अब लोग रात को सोने से डरते हैं। बच्चे शाम ढलते ही घर में बंद हो जाते हैं। कई जगहों पर लोग खुद ही रात में गश्त करने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल में चारा और पानी की कमी की वजह से गुलदार गांवों की तरफ आ रहे हैं, लेकिन इंसानी जानों की कीमत पर यह नहीं चल सकता। वे चाहते हैं कि नरभक्षी जानवरों को जल्द से जल्द पकड़ा या मारा जाए।
आखिर कब तक चलेगा यह खौफ?
उत्तराखंड के पहाड़ों में मानव और वन्यजीविज्ञान का यह टकराव सालों से चल रहा है। विकास के नाम पर जंगलों का कटना, गलियारे बंद होना और शिकार की कमी ने जंगली जानवरों को गांवों तक ला खड़ा किया है। अब जरूरत है लंबे समय तक चलने वाले समाधान की – चाहे वह बड़े पैमाने पर कॉरिडोर बनाना हो, मुआवजे की राशि बढ़ाना हो या स्थानीय लोगों को हथियार प्रशिक्षण देना हो। फिलहाल तो बस यही दुआ की जा रही है कि कोई और घर उजड़ने से पहले यह खूनी खेल रुक जाए।















