उत्तराखंड : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में एक संवेदनशील मामला सामने आया था, जहां एक 14 साल की किशोरी के साथ कथित तौर पर गलत हरकत का आरोप लगा। यह केस रायपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा था और पोक्सो कानून के तहत दर्ज किया गया था। पोक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया विशेष कानून है, जो ऐसे मामलों में सख्त सजा का प्रावधान रखता है।
कैसे शुरू हुई कहानी
अक्टूबर 2024 में किशोरी की मां ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई कि उनकी बेटी घर से गायब हो गई है। काफी खोजबीन के बाद पुलिस ने दावा किया कि लड़की भगत सिंह कॉलोनी में एक युवक गाजी अब्बास के कमरे से मिली। इसके आधार पर पुलिस ने जांच की और आरोप लगाया कि युवक ने धमकी देकर किशोरी के साथ जबरदस्ती की। चार्जशीट दाखिल होते ही मामला अदालत में पहुंच गया।
अदालत में क्या हुआ बदलाव
ट्रायल के दौरान चीजें पूरी तरह पलट गईं। किशोरी की मां ने गवाही में पुलिस की पूरी बात को नकार दिया। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी तो सहेली के घर पढ़ाई करने गई थी और देर हो जाने की वजह से लौट नहीं पाई। मां ने यह भी कहा कि गाजी अब्बास से उनकी बेटी की कोई जान-पहचान नहीं थी और वह कभी उसके कमरे में नहीं गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मां ने आरोप लगाया कि पुलिस ने थाने में उनसे खाली कागजों पर साइन करवा लिए थे। उन्हें नहीं पता था कि उन पर क्या लिखा जाएगा। मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान भी कथित तौर पर दबाव में लिए गए थे। किशोरी खुद भी पुलिस के दावों से सहमत नहीं दिखी।
सबूतों की कमी ने बदला फैसला
अभियोजन पक्ष के वकील ने बताया कि मेडिकल जांच और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स में भी कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले जो आरोपों को साबित कर सकें। पोक्सो कोर्ट की जज अर्चना सागर ने सभी गवाहियों, रिपोर्ट्स और तथ्यों की पड़ताल की। आखिरकार, पर्याप्त सबूत न होने की वजह से अदालत ने गाजी अब्बास को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
यह फैसला न सिर्फ आरोपी के लिए राहत लेकर आया, बल्कि पुलिस की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाता है। ऐसे मामलों में गवाहों का पलटना और सबूतों की कमी आमतौर पर जांच की कमजोरियों को उजागर करती है। पोक्सो जैसे गंभीर कानूनों में सही जांच बेहद जरूरी होती है, ताकि निर्दोष को सजा न हो और असली अपराधी बच न निकले।















