उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सुरक्षा व्यवस्था में बार-बार कमियां उजागर हो रही हैं, जो राज्य की प्रशासनिक तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। हाल ही में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने सबको चौंका दिया।
गुरुवार को जब मुख्यमंत्री सचिवालय से निकल रहे थे, तब उनके काफिले की अगुवाई करने वाली गाड़ी अचानक बंद हो गई। नतीजतन, पूरा काफिला बिना उसकी मदद के आगे बढ़ना पड़ा। और तो और, जैसे ही काफिला गेट से बाहर जाने लगा, वहां खड़ी दूसरी सुरक्षा गाड़ी भी खराब हो गई, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।
इस घटना के पीछे की कहानी कुछ यूं है। मुख्यमंत्री धामी उस दिन सचिवालय में राजस्व से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बैठक ले रहे थे। बैठक खत्म होने के बाद वे गढ़ी कैंट के हिमालय सांस्कृतिक केंद्र में विश्व अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे। लेकिन जैसे ही उनका काफिला रवाना हुआ, आगे चलने वाली पायलट गाड़ी ने काम करना बंद कर दिया।
कई प्रयासों के बाद भी वह स्टार्ट नहीं हुई, इसलिए काफिले को उसे छोड़कर आगे बढ़ना पड़ा। बाहर गेट पर इंतजार कर रही इंटरसेप्टर गाड़ी भी ठप पड़ गई, और पुलिसकर्मियों को उसे धक्का देकर चालू करना पड़ा।
मुख्यमंत्री की सुरक्षा क्यों है इतनी महत्वपूर्ण
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में मुख्यमंत्री की सुरक्षा का मतलब सिर्फ व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरे प्रशासन की विश्वसनीयता से जुड़ा है। यहां का भौगोलिक ढांचा, प्राकृतिक आपदाएं और सीमावर्ती इलाकों की वजह से सुरक्षा चुनौतियां ज्यादा हैं। राज्य सरकार हर साल पुलिस और सुरक्षा विभाग को करोड़ों रुपये का बजट देती है, ताकि आधुनिक उपकरण और वाहन उपलब्ध रहें।
उदाहरण के लिए, 2023-24 के बजट में पुलिस आधुनिकीकरण के लिए करीब 200 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। लेकिन ऐसी घटनाएं बताती हैं कि बजट का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा।
पिछली घटनाओं से क्या सबक नहीं सीखा
यह पहली बार नहीं है जब धामी की सुरक्षा में चूक हुई हो। इसी साल जुलाई में जब वे कॉर्बेट टाइगर रिजर्व गए थे, तब इस्तेमाल की गई जिप्सी गाड़ी की फिटनेस पांच साल पहले ही खत्म हो चुकी थी। वन विभाग ने जांच के बाद चालक और कर्मचारियों पर कार्रवाई की, लेकिन समस्या जड़ से हल नहीं हुई। एक अन्य मौके पर सचिवालय गेट पर एक निजी कार की वजह से मुख्यमंत्री का काफिला आधे घंटे तक फंसा रहा। ये उदाहरण दिखाते हैं कि छोटी-छोटी लापरवाहियां बड़े खतरे का कारण बन सकती हैं।
सुरक्षा काफिले में गाड़ियों की भूमिका समझिए
किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति के काफिले में हर गाड़ी की अपनी खास जिम्मेदारी होती है। पायलट गाड़ी सबसे आगे चलती है और पुलिसकर्मियों से लैस होती है। यह रास्ता साफ करने और जरूरत पड़ने पर हूटर बजाने का काम करती है। आमतौर पर दो पायलट गाड़ियां होती हैं – एक आगे और एक पीछे। वहीं, इंटरसेप्टर गाड़ी ट्रैफिक को कंट्रोल करती है और काफिले को कुछ दूरी तक आगे चलकर रास्ता दिखाती है। इनकी मदद से काफिला सुचारू रूप से चलता है, लेकिन अगर ये खराब हो जाएं तो पूरा सिस्टम प्रभावित होता है।
आगे क्या कदम उठाने चाहिए
ऐसी घटनाओं से साफ है कि सुरक्षा वाहनों की नियमित जांच और रखरखाव पर ज्यादा जोर देना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे राज्य में डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और जीपीएस ट्रैकिंग को मजबूत करके ऐसी समस्याओं से बचा जा सकता है। सरकार को पुलिस विभाग की जवाबदेही बढ़ानी चाहिए, ताकि भविष्य में मुख्यमंत्री या किसी अन्य वीआईपी की सुरक्षा से कोई समझौता न हो। यह न सिर्फ प्रशासन की छवि सुधारेगा, बल्कि जनता का भरोसा भी बढ़ाएगा।















