आज के समय में शहरों में बढ़ते कचरे की समस्या हर किसी को प्रभावित कर रही है। भारत जैसे देश में जहां हर साल लाखों टन ठोस अपशिष्ट पैदा होता है, वहां पर्यावरण को बचाने के लिए मजबूत प्रबंधन व्यवस्था की जरूरत है।
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश में रोजाना करीब 160,000 टन से ज्यादा कचरा उत्पन्न होता है, और 2050 तक यह आंकड़ा 435 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
ऐसे में उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है, जहां भूगोल की वजह से कचरा निपटान में दिक्कतें आती हैं, जैसे लैंडफिल साइट्स की कमी और मिट्टी का कटाव। लेकिन अच्छी खबर यह है कि यहां कई पहल चल रही हैं, जैसे कम्युनिटी आधारित मॉडल वार्ड प्रोग्राम, जो लोगों को जागरूक बनाकर कचरा प्रबंधन में शामिल कर रहे हैं।
ऋषिकेश में पर्यावरण संरक्षण की नई उम्मीद
उत्तराखंड के देहरादून जिले में ऋषिकेश के लालपानी इलाके में एक ऐसा प्रोजेक्ट चल रहा है, जो स्थानीय स्तर पर कचरा समस्या से निपटने में बड़ा बदलाव ला सकता है। यह एक एकीकृत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट है, जिसकी क्षमता रोजाना 240 मीट्रिक टन कचरा प्रोसेस करने की है। इसकी कुल लागत करीब 23 करोड़ रुपये से ज्यादा है, और इसे नगर निगम के जरिए बनाया जा रहा है।
प्लांट का मकसद है कचरे को वैज्ञानिक तरीके से हैंडल करना, जैसे अलग-अलग सामग्री को छांटना, लीचेट (कचरे से निकलने वाला जहरीला पानी) का उपचार करना, और इसे उपयोगी चीजों में बदलना। इससे न सिर्फ प्रदूषण कम होगा, बल्कि स्वच्छता भी बेहतर बनेगी।
जिलाधिकारी का दौरा और प्रगति की समीक्षा
15 दिसंबर 2024 को देहरादून के जिलाधिकारी ने इस साइट पर जाकर खुद कामकाज का जायजा लिया। उन्होंने देखा कि अब तक प्रोजेक्ट का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो चुका है, लेकिन तय समय पर काम खत्म होने की उम्मीद कम लग रही है। मूल योजना के अनुसार, यह प्लांट दिसंबर 2025 तक चालू हो जाना चाहिए था, लेकिन कुछ देरी की वजह से अधिकारियों को सख्त हिदायत दी गई।
डीएम ने निर्माण एजेंसी और नगर निगम से विस्तृत रिपोर्ट मांगी, जिसमें अनुबंध की शर्तें, समय सीमा और आने वाली दिक्कतों का ब्योरा हो। साथ ही, अगर जरूरी हुआ तो जुर्माना या अन्य कार्रवाई की बात भी कही गई।
मशीनरी सेटअप में तेजी लाने की जरूरत
निरीक्षण के दौरान एक बड़ी समस्या सामने आई- प्लांट में जरूरी मशीनें, जैसे लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट (एलटीपी), अभी तक पूरी तरह इंस्टॉल नहीं हुई हैं। लीचेट ट्रीटमेंट का मतलब है कचरे से निकलने वाले हानिकारक तरल को साफ करना, ताकि यह जमीन या पानी को प्रदूषित न करे।
डीएम ने नगर आयुक्त को साफ निर्देश दिए कि इस काम को जल्द से जल्द पूरा किया जाए और लगातार फॉलो-अप करें। उन्होंने जोर दिया कि निर्माण में गुणवत्ता से कोई समझौता न हो, क्योंकि यह प्लांट न सिर्फ कचरा कम करेगा, बल्कि पर्यावरण की रक्षा में भी अहम भूमिका निभाएगा।
भविष्य की योजना और स्थानीय प्रभाव
इस प्लांट से जुड़ी योजनाओं में कचरा अलग-अलग करने की व्यवस्था, मशीनरी का रखरखाव और लंबे समय तक चलाने की रणनीति शामिल है। डीएम ने अधिकारियों से कहा कि तय मानकों का पालन करें और किसी भी लापरवाही को बर्दाश्त न किया जाए। उत्तराखंड में पहले से ही कई जगहों पर कचरा प्रबंधन की दिक्कतें हैं, जैसे शीशंबाड़ा इलाके में पुराना प्लांट जो ठीक से काम नहीं कर रहा।
लेकिन लालपानी का यह प्रोजेक्ट सफल हुआ तो यह मिसाल बन सकता है, खासकर जब राज्य में इंटीग्रेटेड डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल्स पर काम हो रहा है।
इस दौरे में ऋषिकेश के महापौर, मुख्य विकास अधिकारी, नगर आयुक्त और प्रोजेक्ट से जुड़े अन्य लोग भी मौजूद थे। कुल मिलाकर, यह पहल दिखाती है कि स्थानीय प्रशासन पर्यावरण संरक्षण को कितनी गंभीरता से ले रहा है, और अगर समय पर पूरा हुआ तो ऋषिकेश की साफ-सफाई में बड़ा फर्क पड़ेगा।















