उत्तराखंड की हरी-भरी पहाड़ियां और घने जंगल न सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना हैं, बल्कि यहां की जैव विविधता भी दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन यही जंगल अब स्थानीय लोगों के लिए मुश्किलें पैदा कर रहे हैं।
राज्य के पर्वतीय इलाकों में हाथी, तेंदुए, भालू और बंदर जैसे जंगली जानवरों से टकराव की घटनाएं आम हो गई हैं। ये संघर्ष न केवल लोगों की जान को खतरे में डालते हैं, बल्कि फसलों को भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित होती है। हाल के वर्षों में ऐसी घटनाओं में वृद्धि देखी गई है, जो जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और मानवीय अतिक्रमण जैसे कारकों से जुड़ी हुई हैं।
सरकार की सक्रिय पहल: सुरक्षा की नई रणनीति
इस समस्या से निपटने के लिए उत्तराखंड सरकार ने ठोस कदम उठाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में घोषणा की कि राज्य भर में सुरक्षा उपायों को मजबूत किया जाएगा। इसमें सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़बंदी शामिल है, जो जंगली जानवरों को गांवों और खेतों से दूर रखने में मदद करेगी।
यह फेंसिंग पर्यावरण-अनुकूल है और बिजली के झटके से जानवरों को सुरक्षित तरीके से रोकती है, बिना उन्हें नुकसान पहुंचाए। साथ ही, सेंसर-आधारित अलर्ट सिस्टम लगाए जाएंगे, जो जानवरों की मौजूदगी का पता लगाकर लोगों को समय रहते चेतावनी दे सकेंगे। ये तकनीकें आधुनिक हैं और ग्रामीण इलाकों में जीवन को आसान बनाने में कारगर साबित हो सकती हैं।
जनसंख्या नियंत्रण और बचाव केंद्र: लंबी अवधि का समाधान
जंगली जानवरों की बढ़ती संख्या भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है। सरकार ने फैसला किया है कि हर जिले में आधुनिक नसबंदी केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जहां बंदर, सूअर और भालू जैसे जानवरों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए मानवीय तरीके अपनाए जाएंगे। ये केंद्र वन विभाग के अधीन काम करेंगे और जानवरों की सेहत का पूरा ख्याल रखेंगे।
इसके अलावा, प्रभावित जिलों में बचाव और पुनर्वास केंद्र खोले जाएंगे, जहां घायल या समस्या पैदा करने वाले जानवरों को रखा जा सकेगा। रामनगर में पहले से ही बाघ और तेंदुए के लिए ऐसा एक केंद्र चल रहा है, जहां अब तक करीब 25 जानवरों को सफलतापूर्वक बचाया और देखभाल की गई है। इसी मॉडल पर अन्य जानवरों के लिए भी केंद्र बनाए जाएंगे।
भूमि आरक्षण और बजट सहायता: व्यावहारिक कदम
सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए सरकार पर्वतीय क्षेत्रों में कम से कम 10 नाली और मैदानी इलाकों में एक एकड़ जमीन को आरक्षित करेगी, जहां ये केंद्र और सुविधाएं विकसित की जा सकें। इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए, वन विभाग को जाल, पिंजरे और ट्रैंक्विलाइजर जैसी जरूरी चीजों के लिए अतिरिक्त 5 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
ये फंड जल्द ही उपलब्ध होंगे, ताकि योजनाओं को तेजी से लागू किया जा सके। मुख्यमंत्री ने जोर दिया कि आम लोगों की दैनिक जिंदगी को प्रभावित करने वाली इस चुनौती से निपटना सरकार की प्राथमिकता है।
कानूनी बदलाव और केंद्र से सहयोग: आगे की राह
मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए मौजूदा वन्यजीव कानूनों में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। इसमें हिंसक जानवरों को नियंत्रित करने के प्रावधानों को मजबूत करना और वन रेंजरों को अधिक अधिकार देना शामिल है। अगर नियमों में संशोधन की जरूरत पड़ी, तो उसे पूरा किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव से भी इस मुद्दे पर चर्चा की है, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मिल सके और राज्य की स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलाव हो सकें। अगले दो हफ्तों में इन सभी योजनाओं की विस्तृत रणनीति तैयार की जाएगी, जो जमीन पर उतरकर लोगों को राहत प्रदान करेगी।
यह पहल न केवल तात्कालिक समस्याओं का समाधान करेगी, बल्कि लंबे समय में मानव और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने में मददगार साबित होगी। उत्तराखंड जैसे राज्य में जहां पर्यटन और कृषि अर्थव्यवस्था का आधार हैं, ऐसे कदम जरूरी हैं ताकि विकास और संरक्षण साथ-साथ चल सकें।















