देहरादून : उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में पर्यटन को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली संस्था गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) इन दिनों गहरे आर्थिक संकट से जूझ रही है। राज्य सरकार के अपने ही विभागों की ओर से बकाया राशि न चुकाने से निगम की हालत और खराब हो गई है।
यह स्थिति न सिर्फ निगम के दैनिक कार्यों को प्रभावित कर रही है, बल्कि इसके कर्मचारियों की जिंदगी पर भी भारी पड़ रही है। आइए जानते हैं कि यह संकट कैसे शुरू हुआ और इसका असर क्या पड़ रहा है।
जीएमवीएन का महत्व और वर्तमान चुनौतियां
उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, जैसे चार धाम यात्रा, हिल स्टेशन और एडवेंचर स्पॉट्स, पर्यटन को राज्य की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बनाते हैं। जीएमवीएन इसी क्षेत्र में काम करता है, जहां यह होटल, गेस्ट हाउस और पर्यटन पैकेज चलाता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से निगम घाटे में चल रहा है, और अब सरकारी विभागों की देनदारी ने इसे और कमजोर कर दिया।
राज्य सचिवालय प्रशासन और राज्य संपत्ति विभाग ने कुल 19 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया, जबकि निगम ने कई बार पत्र लिखकर अनुरोध किया। यह राशि न चुकाने से निगम को अपने कर्मचारियों का वेतन समय पर देने में मुश्किल हो रही है, जो पर्यटन सीजन के दौरान और भी जरूरी होता है।
कर्मचारियों पर पड़ रहा सीधा असर
निगम के कर्मचारी, जो पर्यटकों को सेवाएं देकर राज्य की छवि चमकाते हैं, अब खुद आर्थिक तंगी का शिकार हो रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) से जुड़ी है। ईपीएफ एक ऐसी योजना है जहां कर्मचारी और नियोक्ता दोनों योगदान देते हैं, ताकि रिटायरमेंट या आपात स्थिति में पैसा मिल सके। जीएमवीएन को ईपीएफ में 16 करोड़ रुपये जमा करने हैं, लेकिन वित्तीय दबाव के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा। नतीजतन, कर्मचारी लोन, अग्रिम निकासी या अन्य लाभ नहीं ले पा रहे। कई कर्मचारियों के लिए यह मुश्किल समय है, क्योंकि वे घर बनाने, बच्चों की शिक्षा या चिकित्सा खर्च के लिए इस फंड पर निर्भर थे।
बकाया राशि का विस्तृत ब्योरा
इस संकट की जड़ में सरकारी विभागों की उदासीनता है। जीएमवीएन के रिकॉर्ड बताते हैं कि सचिवालय प्रशासन पर करीब 14 करोड़ 59 लाख रुपये का बकाया है। राज्य की स्थापना से लेकर अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात कर्मचारियों के वेतन के रूप में 7 करोड़ 51 लाख रुपये और मुख्यमंत्री आवास में काम करने वालों के लिए 9 करोड़ 95 लाख रुपये देने थे।
हालांकि, विभाग ने इनमें से 2 करोड़ 86 लाख रुपये वापस कर दिए हैं, लेकिन बाकी राशि अभी भी लंबित है। यह देरी न सिर्फ निगम की बैलेंस शीट को प्रभावित कर रही है, बल्कि उत्तराखंड के पर्यटन विकास को भी झटका दे रही है, क्योंकि जीएमवीएन जैसे संस्थान राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आगे की राह और संभावित समाधान
उत्तराखंड सरकार पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चला रही है, जैसे इको-टूरिज्म और साहसिक खेलों को प्रमोट करना। लेकिन जीएमवीएन जैसी संस्थाओं को मजबूत किए बिना यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बकाया राशि जल्द चुकाई जाए, तो निगम अपनी सेवाओं को बेहतर बना सकता है और कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान कर सकता है।
राज्य सरकार को इस मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि पर्यटन क्षेत्र मजबूत हो और कर्मचारी बिना चिंता के काम कर सकें। यह संकट एक सबक है कि सरकारी संस्थाओं के बीच समन्वय कितना जरूरी है।















